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Mangal - The Commander

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मंगल के नाम
संस्कृत - भौम, यक्र, कुज, अंगारक, भूमिपुत्र, भूसुत, रुधिर, क्षितिज, महीसुत, क्रूरनेत्र |
अंग्रेजी- मार्स (Mars )
उर्दू- मारिक, मिरीख |

वर्ण – लाल
अवस्था – युवा
लिंग – पुरुष
जाति – क्षत्रिय
स्वरुप – कृश
गुण – तम
तत्त्व- अग्नि (तेज)
प्रकृति – पित्त
दिशा- दक्षिण
धातु – ताम्बा (मतान्तर से स्वर्ण)
रत्न – मूंगा (Coral )

मंगल को काल पुरुष का ' पराक्रम ' माना गया है | अतः यह पराक्रम का प्रतीक है | ग्रह-मंडल में मंगल को ' सेनापति ' का पद मिला हुआ है |

आधिपत्य- मंगल को क्रूर दृष्टि वाला ,पराक्रम, स्फूर्ति, साहस, आत्म-विश्वास, धैर्य,घृणा, उत्तेजना, देशप्रेम, झूठ तथा शास्त्र-विद्या का अधिपति माना गया है |

मंगल से प्रभावित अंग -
शरीर में पेट से पीठ तक का भाग, नाक, कान, शारीरिक बल, रक्त इसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं |

रोग
कुंडली में मंगल के अस्त ,नीच या शत्रु राशि का ,छटे-आठवें-बारहवें भाव में स्थित हो, पाप ग्रहों से युत या दृष्ट, षड्बल विहीन हो तो
चेचक, खसरा, प्लेग या कोई भी संक्रामक रोग, उच्च रक्त चाप, खुजली, फोड़ा-फुंसी, दुर्घटना, पित्त प्रकोप, बवासीर, शस्त्राघात, बिजली का करंट, रक्त विकार, रक्त मज्जा की कमी ,मांसपेशियों की दुर्बलता इत्यादि रोगों से कष्ट हो सकता है |

मंगल को अशुभ पाप ग्रह माना जाता है, यह सूर्य और चन्द्र की तरह हमेशा ' मार्गी ' नहीं रहता, अपितु समय समय पर मार्गी, वक्री तथा अस्त होता रहता है | इसकी स्व-राशियाँ मेष और वृश्चिक हैं | यह मकर राशि में उच्च का, कर्क राशि में नीच का तथा मेष राशि में 12 अंश तक मूलत्रिकोणस्थ होता है | (मकर राशि में 28 अंश तक परमोच्च और कर्क में 28 अंश तक परम नीच का होता है )

मित्र तथा शत्रु
सूर्य, चन्द्र तथा बृहस्पति मंगल के नैसर्गिक मित्र हैं |
शुक्र और शनि से समभाव रखता है |
बुध, राहु और केतु मंगल के नैसर्गिक शत्रु हैं |

यदि आपका मंगल कुपित है तो पढ़ें मंगल के उपाय

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