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नवग्रह वैदिक मंत्र

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भारतवर्ष में अनादिकाल से ही ग्रहों की पूजा देवता स्वरुप में होती चली आ रही है | मानव जीवन में रोग, विपत्ति, दरिद्रता, संकट, दुर्घटना, प्रेतबाधा और अन्य सभी अवरोध नवग्रहों के कारण ही उत्पन्न होते हैं और ग्रहों के दुष्प्रभाव समाप्त होने के बाद यह शांत भी हो जाते हैं | ग्रहों की महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यंतरदशा, सुक्ष्मदशा और प्राणदशा में रोग, शोक और कष्ट उत्पन्न होते हैं एवं उनके समय के पूर्ण होते ही यह संकट अचानक ही समाप्त हो जाते हैं |

नवग्रहों के पूजन का के कई मंत्र हैं, इस ब्लॉग में आपको नवग्रहों के वैदिक मंत्र, उनकी संख्या और उसी समिधा के बारे में बता रहा हूँ, सभी मनुष्यों को नवग्रह का पूजन जाप वर्ष में एक बार अवश्य कारवाना चाहिए | इसको करवाने से ग्रह प्रसन्न होते हैं और जीवन में राजयोग का निर्माण करते हैं |

 सूर्य 

ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।

हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ।।

(यजु. 33। 43, 34। 31)
मंत्र संख्या - 7000
समिधा - मदार

चन्द्र 

ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय।

इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।

(यजु. 10। 18)
मंत्र संख्या - 12000
समिधा - पलाश

मंगल 

ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अय्यम्।

अपां रेतां सि जिन्वति।।

(यजु. 3।12)
मंत्र संख्या - 11000
समिधा - खैर

बुध 

ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च।

अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।।

(यजु. 15।54)
मंत्र संख्या -21000
समिधा - चिडचिडा

गुरु 

ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।

यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।।

(यजु. 26।3)
मंत्र संख्या - 19000
समिधा - पीपल

शुक्र 

ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:।

ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।।

(यजु. 19।75)
मंत्र संख्या - 26000
समिधा - गूलर

शनि 

ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।

शं योरभि स्त्रवन्तु न:।।

(यजु. 36।12)
मंत्र संख्या - 23000
समिधा - शमी

राहु

ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा।

कया शचिष्ठया वृता।।

(यजु. 36।4)
मंत्र संख्या - 18000
समिधा - दुर्बा

केतु 

ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे।

समुषद्भिरजायथा:।।

(यजु. 29।37)
मंत्र संख्या - 18000
समिधा - कुशा

यदि आप अपना या अपने परिवार में किसी भी सदस्य का नवग्रह पुरश्चरण अथवा किसी भी ग्रह-शांति पूजन-जाप-हवन करवाना चाहते हैं, तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं | तीर्थराज प्रयाग की पावन भूमि पर योग्य पुरोहितों द्वारा आपका पूजन उचित मुहूर्त में संपन्न करवाया जायेगा

संपर्क सूत्र - 9198413333, 9336236493

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