Grah


kavach

अमोघ शिव कवच प्रयोग
मै आज सर्व साधारण व समस्त आस्तिक भक्तो के लाभार्थ अति प्राचीन सिद्धीप्रद अमोघ शिव कवच प्रयोग दे रहा हूँ | इसके शुद्ध सत्य अनुष्ठान से भयंकर से भयंकर विपत्ति से छुटकारा मिल जाता है और भगवान आशुतोष की कृपा हो जाती है |

अथ विनियोग:
अस्य श्री शिव कवच स्त्रोत्र मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप छंद:, श्री सदाशिव रुद्रो देवता, ह्रीं शक्ति:, रं कीलकम, श्रीं ह्रीं क्लीं बीजं, श्री सदाशिव प्रीत्यर्थे शिवकवच स्त्रोत्र जपे विनियोग: |

अथ न्यास: ( पहले सभी मंत्रो को बोलकर क्रम से करन्यास करे | तदुपरांत इन्ही मंत्रो से अंगन्यास करे| )

करन्यास
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
ह्रां सर्वशक्तिधाम्ने इशानात्मने अन्गुष्ठाभ्याम नम: |
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
नं रिं नित्यतृप्तिधाम्ने तत्पुरुषातमने तर्जनीभ्याम नम: |
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
मं रूं अनादिशक्तिधाम्ने अधोरात्मने मध्यमाभ्याम नम:|
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
शिं रैं स्वतंत्रशक्तिधाम्ने वामदेवात्मने अनामिकाभ्याम नम: |
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
वां रौं अलुप्तशक्तिधाम्ने सद्योजातात्मने कनिष्ठिकाभ्याम नम: |
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
यं र: अनादिशक्तिधाम्ने सर्वात्मने करतल करपृष्ठाभ्याम नम: |

अंगन्यास
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
ह्रां सर्वशक्तिधाम्ने इशानात्मने हृदयाय नम: |
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
नं रिं नित्यतृप्तिधाम्ने तत्पुरुषातमने शिरसे स्वाहा |
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
मं रूं अनादिशक्तिधाम्ने अधोरात्मने शिखायै वषट |
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
शिं रैं स्वतंत्रशक्तिधाम्ने वामदेवात्मने नेत्रत्रयाय वौषट |
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
वां रौं अलुप्तशक्तिधाम्ने सद्योजातात्मने कवचाय हुम |
नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने
यं र: अनादिशक्तिधाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट |

अथ दिग्बन्धन:

भूर्भुव: स्व: |

ध्यानम
कर्पुरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम |
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ||

श्री शिव कवचम


नमो भगवते सदा-शिवाय । त्र्यम्बक सदा-शिव ! नमस्ते-
नमस्ते । ह्रीं ह्लीं लूं अः एं ऐं महा-घोरेशाय नमः । ह्रीं
ह्रौं शं नमो भगवते सदा-शिवाय ।

सकलतत्वात्मकाय, सर्वमंत्रस्वरूपाय, सर्वमंत्राधिष्ठिताय, सर्वतंत्रस्वरूपाय, सर्वतत्वविदूराय, ब्रह्मरुद्रावतारिणे, नीलकंठाय, पार्वतीमनोहरप्रियाय, सोमसुर्याग्नीलोचनाय, भस्मोधूलितविग्रहाय, महामणिमुकुटधारणाय, माणिक्यभूषणाय, सृष्टिस्थितिप्रलयकालरौद्रावताराय, दक्षाध्वरध्वन्सकाय, महाकालभेदनाय, मुलाधारैकनिलयाय, तत्वातीताय, गंगाधराय, सर्वदेवाधिदेवाय, षडाश्रयाय, वेदांतसाराय, त्रिवर्गसाधनाया नेक्कोटीब्रहमांडनायकायानन्त्वासुकीतक्षककर्कोटकशंखकुलिकपद्ममहापद्मेत्यष्टनागकुलभूषणाय, प्रणवरूपाय, चिदाकाशायाकाशदिकस्वरूपाय, ग्रहनक्षत्रमालिने, सकलायकलंकरहिताय, सकललोकैककर्त्रे, सकललोकैकसंहर्त्रे, सकललोकैकगुरवे, सकललोकैकभर्त्रे, सकललोकैकसाक्षीणे, सकलनिगमगुह्याय, सकलवेदांतपारगाय, सकललोकैकवरप्रदाय, सकललोकैकशंकराय, शशांकशेखराय, शाश्वतनिजावासाय, निराभासाय, निरामयाय, निर्मलाय, निर्लोभाय, निर्मोहाय, निर्मदाय, निश्चिन्ताय, निर्हंकाराय, निराकुलाय, निष्कलन्काय, निर्गुणाय, निष्कामाय, निरुप्लवाय, नीवद्याय, निरन्तराय, निष्कारणाय, निरातंकाय, निष्प्रपंचाय, नि:संगाय, निर्द्वंदाय, निराधाराय, नीरोगाय, निष्क्रोधाय, निर्गमाय, निष्पापाय, निर्भयाय, निर्विकल्पाय, निर्भेदाय, निष्क्रियाय, निस्तुल्याय, निस्संशयाय, निरंजनाय, निरुपम विभवाय, नित्यशुद्धबुद्धपरिपूर्णसच्चिदानंदाद्वयाय, परमशांतस्वरूपाय, तेजोरूपाय, तेजोमयाय, जयजय रूद्रमहारौद्र, भद्रावतार, महाभैरव, कालभैरव, कल्पान्तभैरव, कपाल मालाधर, खट्वांगखंगचर्मपाशांकुशडमरूकरत्रिशूल चापबाणगदाशक्तिभिन्दिपालतोमरमुसलमुदगरप्रासपरिघभुशुण्डीशतघ्नीचक्रद्यायुद्धभीषणकर, सहस्रमुख, दंष्ट्रा कराल वदन, विक्टाट हास विस्फारित ब्रहमांड मंडल, नागेन्द्र कुंडल, नागेन्द्रहार, नागेन्द्र वलय, नागेन्द्र चर्मधर, मृत्युंजय, त्रयम्बक, त्रिपुरान्तक, विश्वरूप, विरूपाक्ष, विश्वेश्वर, वृषवाहन, विश्वतोमुख सर्वतो रक्ष रक्ष माम |
ज्वल ज्वल महामृत्युअपमृत्युभयं नाशय नाशय चौर भयंमुत्सारयोत्सारय: विष सर्प भयं शमय शमय: चौरान मारय मारय: मम शत्रून उच्चाटयोच्चाटय: त्रिशुलेंन विदारय विदारय: कुठारेण भिन्धि भिन्धि: खंगेन छिन्धि छिन्धि: खट्वांगेन विपोथय विपोथय: मूसलेन निष्पेषय निष्पेषय: बाणे: संताडय संताडय: रक्षांसि भीषय भीषयाशेष्भूतानी विद्रावय विद्रावय: कुष्मांडवेतालमारीचब्रहमराक्षसगणान संत्रासय संत्रासय: माम अभयं कुरु कुरु: वित्रस्तं माम अश्वास्याश्वसय: नरक भयान माम उद्धरौद्धर: संजीवय संजीवय: क्षुत्रिडभ्यां माम आप्यापय आप्यापय: दु:खातुरं माम आनंदय आनंदय : शिव कवचे न माम आच्छादय आच्छादय: मृत्युंजय! त्रयम्बक! सदाशिव!!! नमस्ते नमस्ते ||

विशेष सूचना:- हमने अपने बहुत से भक्तो की अनेक भयानक से भयानक विपत्तियों का निराकरण इस शिव कवच के अनुष्ठान से कर दिया है | सी बी आई के केसों में फसे हुओ को भी हमने इस शिव कवच और माँ बगलामुखी के अनुष्ठान से सकुशल बचाया और उन केसों में विजय प्राप्ति करवाई है ||

ॐ नमो भगवते सदा-शिवाय । त्र्यम्बक सदा-शिव ! नमस्ते-
नमस्ते । ॐ ह्रीं ह्लीं लूं अः एं ऐं महा-घोरेशाय नमः । ह्रीं ॐ
ह्रौं शं नमो भगवते सदा-शिवाय ।
सकल-तत्त्वात्मकाय, आनन्द-सन्दोहाय, सर्व-मन्त्र-
स्वरूपाय, सर्व-यंत्राधिष्ठिताय, सर्व-तंत्र-प्रेरकाय, सर्व-
तत्त्व-विदूराय,सर्-तत्त्वाधिष्ठिताय, ब्रह्म-रुद्रावतारिणे,
नील-कण्ठाय, पार्वती-मनोहर-प्रियाय, महा-रुद्राय, सोम-
सूर्याग्नि-लोचनाय, भस्मोद्-धूलित-विग्रहाय, अष्ट-गन्धादि-
गन्धोप-शोभिताय, शेषाधिप-मुकुट-भूषिताय, महा-मणि-मुकुट-
धारणाय, सर्पालंकाराय, माणिक्य-भूषणाय, सृष्टि-स्थिति-
प्रलय-काल-रौद्रावताराय, दक्षाध्वर-ध्वंसकाय, महा-काल-
भेदनाय, महा-कालाधि-कालोग्र-रुपाय, मूलाधारैक-निलयाय ।
तत्त्वातीताय, गंगा-धराय, महा-प्रपात-विष-भेदनाय, महा-
प्रलयान्त-नृत्याधिष्ठिताय, सर्व-देवाधि-देवाय, षडाश्रयाय,
सकल-वेदान्त-साराय, त्रि-वर्ग-साधनायानन्त-कोटि-
ब्रह्माण्ड-नायकायानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोट-शङ्ख-
कुलिक-पद्म-महा-पद्मेत्यष्ट-महा-नाग-कुल-भूषणाय, प्रणव-
स्वरूपाय । ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः, हां हीं हूं हैं हौं हः ।
चिदाकाशायाकाश-दिक्स्वरूपाय, ग्रह-नक्षत्रादि-सर्व-
प्रपञ्च-मालिने, सकलाय, कलङ्क-रहिताय, सकल-लोकैक-
कर्त्रे, सकल-लोकैक-भर्त्रे, सकल-लोकैक-संहर्त्रे, सकल-
लोकैक-गुरवे, सकल-लोकैक-साक्षिणे, सकल-निगम-गुह्याय,
सकल-वेदान्त-पारगाय, सकल-लोकैक-वर-प्रदाय, सकल-
लोकैक-सर्वदाय, शर्मदाय, सकल-लोकैक-शंकराय ।
शशाङ्क-शेखराय, शाश्वत-निजावासाय, निराभासाय,
निराभयाय, निर्मलाय, निर्लोभाय, निर्मदाय, निश्चिन्ताय,
निरहङ्काराय, निरंकुशाय, निष्कलंकाय, निर्गुणाय,
निष्कामाय, निरुपप्लवाय, निरवद्याय, निरन्तराय,
निष्कारणाय, निरातङ्काय, निष्प्रपंचाय, निःसङ्गाय,
निर्द्वन्द्वाय, निराधाराय, नीरागाय, निष्क्रोधाय, निर्मलाय,
निष्पापाय, निर्भयाय, निर्विकल्पाय, निर्भेदाय, निष्क्रियाय,
निस्तुलाय, निःसंशयाय, निरञ्जनाय, निरुपम-विभवाय, नित्य-
शुद्ध-बुद्धि-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय, ॐ हसौं ॐ
हसौः ह्रीम सौं क्षमलक्लीं क्षमलइस्फ्रिं ऐं
क्लीं सौः क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ।
परम-शान्त-स्वरूपाय, सोहं-तेजोरूपाय, हंस-तेजोमयाय,
सच्चिदेकं ब्रह्म महा-मन्त्र-स्वरुपाय,
श्रीं ह्रीं क्लीं नमो भगवते विश्व-गुरवे, स्मरण-मात्र-
सन्तुष्टाय, महा-ज्ञान-प्रदाय, सच्चिदानन्दात्मने महा-
योगिने सर्व-काम-फल-प्रदाय, भव-बन्ध-प्रमोचनाय,
क्रों सकल-विभूतिदाय, क्रीं सर्व-विश्वाकर्षणाय ।
जय जय रुद्र, महा-रौद्र, वीर-भद्रावतार, महा-भैरव, काल-
भैरव, कल्पान्त-भैरव, कपाल-माला-धर, खट्वाङ्ग-खङ्ग-
चर्म-पाशाङ्कुश-डमरु-शूल-चाप-बाण-गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-
तोमर-मुसल-मुद्-गर-पाश-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-ब्रह्मास्त्र-
पाशुपतास्त्रादि-महास्त्र-चक्रायुधाय ।
भीषण-कर-सहस्र-मुख-दंष्ट्रा-कराल-वदन-विकटाट्ट-हास-
विस्फारित ब्रह्माण्ड-मंडल नागेन्द्र-कुण्डल नागेन्द्र-हार
नागेन्द्र-वलय नागेन्द्र-चर्म-धर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक
त्रिपुरान्तक विश्व-रूप विरूपाक्ष विश्वम्भर विश्वेश्वर वृषभ-
वाहन वृष-विभूषण, विश्वतोमुख ! सर्वतो रक्ष रक्ष, ज्वल
ज्वल प्रज्वल प्रज्वल स्फुर स्फुर आवेशय आवेशय, मम
हृदये प्रवेशय प्रवेशय, प्रस्फुर प्रस्फुर ।
महा-मृत्युमप-मृत्यु-भयं नाशय-नाशय, चोर-भय-
मुत्सादयोत्सादय, विष-सर्प-भयं शमय शमय, चोरान् मारय
मारय, मम शत्रुनुच्चाट्योच्चाटय, मम क्रोधादि-सर्व-सूक्ष्म-
तमात् स्थूल-तम-पर्यन्त-स्थितान् शत्रूनुच्चाटय, त्रिशूलेन
विदारय विदारय, कुठारेण भिन्धि भिन्धि, खड्गेन
छिन्धि छिन्धि, खट्वांगेन विपोथय विपोथय, मुसलेन निष्पेषय
निष्पेषय, वाणैः सन्ताडय सन्ताडय, रक्षांसि भीषय भीषय,
अशेष-भूतानि विद्रावय विद्रावय, कूष्माण्ड-वेताल-मारीच-
गण-ब्रह्म-राक्षस-गणान् संत्रासय संत्रासय, सर्व-रोगादि-
महा-भयान्ममाभयं कुरु कुरु, वित्रस्तं मामाश्वासयाश्वासय,
नरक-महा-भयान्मामुद्धरोद्धर, सञ्जीवय सञ्जीवय, क्षुत्-
तृषा-ईर्ष्यादि-विकारेभ्यो मामाप्याययाप्यायय दुःखातुरं
मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादयाच्छादय ।
मृत्युञ्जय त्र्यंबक सदाशिव ! नमस्ते नमस्ते, शं ह्रीं ॐ
ह्रों ।

||●|| शिव कवच ||●||

श्री शिव कवच

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ॐ नमो भगवते सदा-शिवाय । त्र्यम्बक सदा-शिव ! नमस्ते-
नमस्ते । ॐ ह्रीं ह्लीं लूं अः एं ऐं महा-घोरेशाय नमः । ह्रीं ॐ
ह्रौं शं नमो भगवते सदा-शिवाय ।
सकल-तत्त्वात्मकाय, आनन्द-सन्दोहाय, सर्व-मन्त्र-
स्वरूपाय, सर्व-यंत्राधिष्ठिताय, सर्व-तंत्र-प्रेरकाय, सर्व-
तत्त्व-विदूराय,सर्-तत्त्वाधिष्ठिताय, ब्रह्म-रुद्रावतारिणे,
नील-कण्ठाय, पार्वती-मनोहर-प्रियाय, महा-रुद्राय, सोम-
सूर्याग्नि-लोचनाय, भस्मोद्-धूलित-विग्रहाय, अष्ट-गन्धादि-
गन्धोप-शोभिताय, शेषाधिप-मुकुट-भूषिताय, महा-मणि-मुकुट-
धारणाय, सर्पालंकाराय, माणिक्य-भूषणाय, सृष्टि-स्थिति-
प्रलय-काल-रौद्रावताराय, दक्षाध्वर-ध्वंसकाय, महा-काल-
भेदनाय, महा-कालाधि-कालोग्र-रुपाय, मूलाधारैक-निलयाय ।
तत्त्वातीताय, गंगा-धराय, महा-प्रपात-विष-भेदनाय, महा-
प्रलयान्त-नृत्याधिष्ठिताय, सर्व-देवाधि-देवाय, षडाश्रयाय,
सकल-वेदान्त-साराय, त्रि-वर्ग-साधनायानन्त-कोटि-
ब्रह्माण्ड-नायकायानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोट-शङ्ख-
कुलिक-पद्म-महा-पद्मेत्यष्ट-महा-नाग-कुल-भूषणाय, प्रणव-
स्वरूपाय । ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः, हां हीं हूं हैं हौं हः ।
चिदाकाशायाकाश-दिक्स्वरूपाय, ग्रह-नक्षत्रादि-सर्व-
प्रपञ्च-मालिने, सकलाय, कलङ्क-रहिताय, सकल-लोकैक-
कर्त्रे, सकल-लोकैक-भर्त्रे, सकल-लोकैक-संहर्त्रे, सकल-
लोकैक-गुरवे, सकल-लोकैक-साक्षिणे, सकल-निगम-गुह्याय,
सकल-वेदान्त-पारगाय, सकल-लोकैक-वर-प्रदाय, सकल-
लोकैक-सर्वदाय, शर्मदाय, सकल-लोकैक-शंकराय ।
शशाङ्क-शेखराय, शाश्वत-निजावासाय, निराभासाय,
निराभयाय, निर्मलाय, निर्लोभाय, निर्मदाय, निश्चिन्ताय,
निरहङ्काराय, निरंकुशाय, निष्कलंकाय, निर्गुणाय,
निष्कामाय, निरुपप्लवाय, निरवद्याय, निरन्तराय,
निष्कारणाय, निरातङ्काय, निष्प्रपंचाय, निःसङ्गाय,
निर्द्वन्द्वाय, निराधाराय, नीरागाय, निष्क्रोधाय, निर्मलाय,
निष्पापाय, निर्भयाय, निर्विकल्पाय, निर्भेदाय, निष्क्रियाय,
निस्तुलाय, निःसंशयाय, निरञ्जनाय, निरुपम-विभवाय, नित्य-
शुद्ध-बुद्धि-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय, ॐ हसौं ॐ
हसौः ह्रीम सौं क्षमलक्लीं क्षमलइस्फ्रिं ऐं
क्लीं सौः क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ।
परम-शान्त-स्वरूपाय, सोहं-तेजोरूपाय, हंस-तेजोमयाय,
सच्चिदेकं ब्रह्म महा-मन्त्र-स्वरुपाय,
श्रीं ह्रीं क्लीं नमो भगवते विश्व-गुरवे, स्मरण-मात्र-
सन्तुष्टाय, महा-ज्ञान-प्रदाय, सच्चिदानन्दात्मने महा-
योगिने सर्व-काम-फल-प्रदाय, भव-बन्ध-प्रमोचनाय,
क्रों सकल-विभूतिदाय, क्रीं सर्व-विश्वाकर्षणाय ।
जय जय रुद्र, महा-रौद्र, वीर-भद्रावतार, महा-भैरव, काल-
भैरव, कल्पान्त-भैरव, कपाल-माला-धर, खट्वाङ्ग-खङ्ग-
चर्म-पाशाङ्कुश-डमरु-शूल-चाप-बाण-गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-
तोमर-मुसल-मुद्-गर-पाश-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-ब्रह्मास्त्र-
पाशुपतास्त्रादि-महास्त्र-चक्रायुधाय ।
भीषण-कर-सहस्र-मुख-दंष्ट्रा-कराल-वदन-विकटाट्ट-हास-
विस्फारित ब्रह्माण्ड-मंडल नागेन्द्र-कुण्डल नागेन्द्र-हार
नागेन्द्र-वलय नागेन्द्र-चर्म-धर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक
त्रिपुरान्तक विश्व-रूप विरूपाक्ष विश्वम्भर विश्वेश्वर वृषभ-
वाहन वृष-विभूषण, विश्वतोमुख ! सर्वतो रक्ष रक्ष, ज्वल
ज्वल प्रज्वल प्रज्वल स्फुर स्फुर आवेशय आवेशय, मम
हृदये प्रवेशय प्रवेशय, प्रस्फुर प्रस्फुर ।
महा-मृत्युमप-मृत्यु-भयं नाशय-नाशय, चोर-भय-
मुत्सादयोत्सादय, विष-सर्प-भयं शमय शमय, चोरान् मारय
मारय, मम शत्रुनुच्चाट्योच्चाटय, मम क्रोधादि-सर्व-सूक्ष्म-
तमात् स्थूल-तम-पर्यन्त-स्थितान् शत्रूनुच्चाटय, त्रिशूलेन
विदारय विदारय, कुठारेण भिन्धि भिन्धि, खड्गेन
छिन्धि छिन्धि, खट्वांगेन विपोथय विपोथय, मुसलेन निष्पेषय
निष्पेषय, वाणैः सन्ताडय सन्ताडय, रक्षांसि भीषय भीषय,
अशेष-भूतानि विद्रावय विद्रावय, कूष्माण्ड-वेताल-मारीच-
गण-ब्रह्म-राक्षस-गणान् संत्रासय संत्रासय, सर्व-रोगादि-
महा-भयान्ममाभयं कुरु कुरु, वित्रस्तं मामाश्वासयाश्वासय,
नरक-महा-भयान्मामुद्धरोद्धर, सञ्जीवय सञ्जीवय, क्षुत्-
तृषा-ईर्ष्यादि-विकारेभ्यो मामाप्याययाप्यायय दुःखातुरं
मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादयाच्छादय ।
मृत्युञ्जय त्र्यंबक सदाशिव ! नमस्ते नमस्ते, शं ह्रीं ॐ
ह्रों ।

साभार-:

http://www.IndianAstroVedic.com

 

 

 

 

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||●|| श्री बगलाप्रतंगिरा कवचम् ||●||

श्री बगलाप्रत्यंगिरा कवचम्

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शिव उवाच
अधुनाऽहं प्रवक्ष्यामि
बगलायाःसुदुर्लभम् ।
यस्य पठन मात्रेण पवनोपि स्थिरायते

प्रत्यंगिरां तां देवेशि श्रृणुष्व
कमलानने ।
यस्य स्मरण मात्रेण शत्रवो विलयं
गताः ॥
श्री देव्युवाच
स्नेहोऽस्ति यदि मे नाथ संसारार्णव
तारक ।
तथा कथय मां शम्भो बगलाप्रत्यंगिरा
मम ॥

श्री भैरव उवाच

यं यं प्रार्थयते मन्त्री
हठात्तंतमवाप्नुयात् ।
विद्वेषणाकर्षणे च स्तम्भनं वैरिणां
विभो ॥
उच्चाटनं मारणं च येन कर्तुं क्षमो
भवेत् ।
तत्सर्वं ब्रूहि मे देव यदि मां दयसे
हर ॥

शिवउवाच

अधुना हि महादेवि परानिष्ठा
मतिर्भवेत् ।
अतएव महेशानि किंचिन्न वक्तुतुमर्हसि

श्री पार्वत्युवाच
जिघान्सन्तं तेन ब्रह्महा भवेत् ।
श्रृतिरेषाहि गिरिश कथं मां त्वं
निनिन्दसि ॥

श्री शिव उवाच

साधु-साधु प्रवक्ष्यामि
श्रृणुष्वावहितानघे ।
प्रत्यंगिरां
बगलायाःसर्वशत्रुनिवारिणीम् ॥
नाशिनीं सर्वदुष्टानां
सर्वपापौघहारिणिम् ।
सर्वप्राणि हितां देवीं सर्वदुःख
निवारिणीम् ॥
भोगदां-मोक्षदां चैव राज्य
सौभाग्यदायिनीम् ।
मन्त्रदोष प्रमोचनीं ग्रहदोष
विनाशिनीम् ॥

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विनियोग

ॐ अस्य श्रीबगला प्रत्यंगिरा
मन्त्रस्य नारद ऋषि
स्त्रिष्टुप् छन्दःप्रत्यंगिरा देवता ह्लीं
बीजं हुं शक्तिः ह्रीं कीलकं ह्लीं ह्लीं
ह्लीं ह्लीं प्रत्यंगिरा मम शत्रु विनाशे
विनियोगः ।

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ॐ प्रत्यंगिरायै नमः । प्रत्यंगिरे
सकलकामान् सिद्ध्यर्थं मम रक्षां
कुरु-कुरु सर्वान् शत्रून् खादय-खादय
मारय-मारय घातय-घातय ॐ ह्रीं फट्
स्वाहा ।

ॐ भ्रामरी स्तम्भिनी देवी क्षोभिणी
मोहिनी तथा ।
संहारिणी द्राविणी च जृम्भिणी
रौद्ररुपिणी ॥
इत्यष्टौ शक्तयो देवि शत्रु पक्षे
नियोजिताः ।
धारयेत् कण्ठदेशे च सर्वशत्रु
विनाशिनी ॥
ॐ ह्रीं भ्रामरि सर्वशत्रून् भ्रामय-
भ्रामय ॐ ह्रीं स्वाहा ।
ॐ ह्रीं स्तम्भिनी मम शत्रून्
स्तम्भय-स्तम्भय ॐ ह्रीं स्वाहा ।
ॐ ह्रीं क्षोभिणी मम शत्रून् क्षोभय-
क्षोभय ॐ ह्रीं स्वाहा ।
ॐ ह्रीं मोहिनी मम शत्रून्मोहय-मोहय
ॐ ह्रीं स्वाहा ।
ॐ ह्रीं संहारिणि मम शत्रून् संहारय-
संहारय ॐ ह्रीं स्वाहा ।
ॐ ह्रीं द्राविणि मम शत्रून् द्रावय-
द्रावय ॐ ह्रीं स्वाहा ।
ॐ ह्रीं जृम्भिणि मम शत्रून् जृम्भय-
जृम्भय ॐ ह्रीं स्वाहा ।
ॐ ह्रीं रौद्रि मम शत्रून् सन्तापय-
सन्तापय ॐ ह्रीं स्वाहा ।
इयं विद्या महाविद्या सर्वशत्रु
निवारिणी ।
धारिता साधकेन्द्रेण सर्वान् दुष्टान्
विनाशयेत् ॥
त्रिसन्ध्यमेकसन्धऽयं वा यः
पठेत्स्थिरमानसः ।
न तस्य दुर्लभं लोके कल्पवृक्ष इव
स्थितः ॥
यं य स्पृशति हस्तेन यं यं पश्यति
चक्षुषा ।
स एव दासतां याति सारात्सारामिमं
मनुम् ॥

॥ श्री रुद्रयामले शिव-पार्वती संवादे
बगला प्रत्यंगिरा कवचम् ॥

 

 

 

 

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||●|| अमोघ श्री शिव कवच ||●||

श्री शिवकवचम्

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विनियोगः-

ॐ अस्य
श्रीशिवकवचस्तोत्रमंत्रस्य
ब्रह्मा ऋषि: अनुष्टप् छन्द:।
श्रीसदाशिवरुद्रो देवता। ह्रीं शक्ति:।
रं कीलकम्। श्रीं ह्री क्लीं बीजम्।
श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थे
शिवकवचस्तोत्रजपे विनियोग:।

कर-न्यास: – ॐ नमो भगवते
ज्वलज्ज्वालामालिने ॐ
ह्लांसर्वशक्तिधाम्ने ईशानात्मने
अंगुष्ठाभ्यां नम: । ॐ नमो भगवते
ज्वलज्ज्वालामालिने ॐ नं
रिं नित्यतृप्तिधाम्ने तत्पुरुषात्मने
तर्जनीभ्यां नम: । ॐ नमो भगवते
ज्वलज्ज्वालामालिने ॐ मं रुं
अनादिशक्तिधाम्ने अघोरात्मने
मध्यामाभ्यां नम: । ॐ नमो भगवते
ज्वलज्ज्वालामालिने ॐ शिं रैं
स्वतंत्रशक्तिधाम्ने वामदेवात्मने
अनामिकाभ्यां नम: । ॐ नमो भगवते
ज्वलज्ज्वालामालिने ॐ
वांरौं अलुप्तशक्तिधाम्ने
सद्यो जातात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नम:
। ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐयंर: अनादिशक्तिधाम्ने सर्वात्मने
करतल करपृष्ठाभ्यां नम:।

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॥ ध्यानम् ॥

वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं
कालकण्ठमरिन्दमम् ।
सहस्रकरमत्युग्रं वंदे शंभुमुपतिम् ॥ १ ॥

।।ऋषभ उवाच।।

अथापरं सर्वपुराणगुह्यं
निशे:षपापौघहरं पवित्रम् ।
जयप्रदं सर्वविपत्प्रमोचनं
वक्ष्यामि शैवं कवचं हिताय ते ॥ २॥
नमस्कृत्य महादेवं
विश्वव्यापिनमीश्वरम्।
वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं
नृणाम् ॥ ३ ॥
शुचौ देशे
समासीनो यथावत्कल्पितासन: ।
जितेन्द्रियो
जितप्राणश्चिंतयेच्छिवमव्ययम् ॥ ४॥
ह्रत्पुंडरीक तरसन्निविष्टं
स्वतेजसा व्याप्तनभोवकाशम् ।
अतींद्रियं
सूक्ष्ममनंतताद्यंध्यायेत्परानंदमयं
महेशम् ॥ ५ ॥
ध्यानावधूताखिलकर्मबन्धश्चरं
चितानन्दनिमग्नचेता: ।
षडक्षरन्याससमाहितात्मा शैवेन
कुर्यात्कवचेन रक्षाम् ॥ ६ ॥
मां पातु देवोऽखिलदेवत्मा संसारकूपे
पतितं गंभीरे
तन्नाम दिव्यं वरमंत्रमूलं धुनोतु मे
सर्वमघं ह्रदिस्थम् ॥ ७ ॥
सर्वत्रमां रक्षतु
विश्वमूर्तिर्ज्योतिर्मयानंदघनश्चिदात्
मा ।
अणोरणीयानुरुशक्तिरेक: स ईश्वर:
पातु भयादशेषात् ॥ ८ ॥
यो भूस्वरूपेण बिर्भीत विश्वं पायात्स
भूमेर्गिरिशोऽष्टमूर्ति: ॥
योऽपांस्वरूपेण नृणां करोति संजीवनं
सोऽवतु मां जलेभ्य: ॥ ९ ॥
कल्पावसाने
भुवनानि दग्ध्वा सर्वाणि यो नृत्यति
भूरिलील: ।
स कालरुद्रोऽवतु
मां दवाग्नेर्वात्यादिभीतेरखिलाच्च
तापात् ॥ १० ॥
प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासो
विद्यावराभीति कुठारपाणि: ।
चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्र:
प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्त्रम् ॥११ ॥
कुठारवेदांकुशपाशशूलकपालढक्काक्षगु
णान् दधान: ।
चतुर्मुखोनीलरुचिस्त्रिनेत्र:
पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥ १२॥
कुंदेंदुशंखस्फटिकावभासो वेदाक्षमाला
वरदाभयांक: ।
त्र्यक्षश्चतुर्वक्र उरुप्रभाव:
सद्योधिजातोऽवस्तु मां प्रतीच्याम् ॥१३ ॥
वराक्षमालाभयटंकहस्त: सरोज
किंजल्कसमानवर्ण: ।
त्रिलोचनश्चारुचतुर्मुखो मां
पायादुदीच्या दिशि वामदेव: ॥ १४ ॥
वेदाभ्येष्टांकुशपाश
टंककपालढक्काक्षकशूलपाणि: ॥
सितद्युति: पंचमुखोऽवतान्मामीशान
ऊर्ध्वं परमप्रकाश: ॥ १५ ॥
मूर्धानमव्यान्मम चंद्रमौलिर्भालं
ममाव्यादथ भालनेत्र: ।
नेत्रे ममा व्याद्भगनेत्रहारी नासां सदा
रक्षतु विश्वनाथ: ॥ १६ ॥
पायाच्छ्र ती मे श्रुतिगीतकीर्ति:
कपोलमव्यात्सततं कपाली ।
वक्रं सदा रक्षतु
पंचवक्रो जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्व:
॥ १७ ॥
कंठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठ: पाणि:
द्वयं पातु: पिनाकपाणि: ।
दोर्मूलमव्यान्मम
धर्मवाहुर्वक्ष:स्थलं
दक्षमखातकोऽव्यात् ॥ १८ ॥
मनोदरं पातु गिरींद्रधन्वा मध्यं
ममाव्यान्मदनांतकारी ।
हेरंबतातो मम पातु
नाभिं पायात्कटिं धूर्जटिरीश्वरो मे ॥
१९ ॥
ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो जानुद्वयं मे
जगदीश्वरोऽव्यात् ।
जंघायुगंपुंगवकेतुख्यातपादौ
ममाव्यत्सुरवंद्यपाद: ॥ २० ॥
महेश्वर: पातु दिनादियामे
मां मध्ययामेऽवतु वामदेव: ॥
त्रिलोचन: पातु तृतीययामे वृषध्वज:
पातु दिनांत्ययामे ॥ २१ ॥
पायान्निशादौ शशिशेखरो मां गंगाधरो
रक्षतु मां निशीथे ।
गौरी पति: पातु निशावसाने
मृत्युंजयो रक्षतु सर्वकालम् ॥ २२ ॥
अन्त:स्थितं रक्षतु शंकरो मां स्थाणु:
सदापातु बहि: स्थित माम् ।
तदंतरे पातु पति:
पशूनां सदाशिवोरक्षतु मां समंतात् ॥ २३ ॥
तिष्ठतमव्याद्भुवनैकनाथ:
पायाद्व्रजंतं प्रथमाधिनाथ: ।
वेदांतवेद्योऽवतु मां निषण्णं मामव्यय:
पातु शिव: शयानम् ॥ २४ ॥
मार्गेषु मां रक्षतु नीलकंठ:
शैलादिदुर्गेषु पुरत्रयारि: ।
अरण्यवासादिमहाप्रवासे
पायान्मृगव्याध उदारशक्ति: ॥ २५ ॥
कल्पांतकोटोपपटुप्रकोप-
स्फुटाट्टहासोच्चलितांडकोश: ।
घोरारिसेनर्णवदुर्निवारमहाभयाद्रक्षतु
वीरभद्र: ॥ २६ ॥
पत्त्यश्वमातंगघटावरूथसहस्रलक्षायु
तकोटिभीषणम् ।
अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां
छिंद्यान्मृडोघोर कुठार धारया २७ ॥
निहंतु
दस्यून्प्रलयानलार्चिर्ज्वलत्रिशूलं
त्रिपुरांतकस्य ।
शार्दूल
सिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान्संत्रासयत्वीश
धनु: पिनाक: ॥ २८ ॥

दु:स्वप्नदु:
शकुनदुर्गतिदौर्मनस्यर्दुर्भ
िक्षदुर्व्यसनदु:सहदुर्यशांसि ।
उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्ति
व्याधींश्च नाशयतु मे जगतामधीश: ॥२९ ॥

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ॐ नमो भगवते सदाशिवाय
सकलतत्त्वात्मकाय
सर्वमंत्रस्वरूपाय
सर्वयंत्राधिष्ठिताय
सर्वतंत्रस्वरूपाय सर्वत्त्वविदूराय
ब्रह्मरुद्रावतारिणे नीलकंठाय
पार्वतीमनोहरप्रियाय
सोमसूर्याग्निलोचनाय
भस्मोद्धूलितविग्रहाय
महामणिमुकुटधारणाय माणिक्यभूषणाय
सृष्टिस्थितिप्रलयकालरौद्रावताराय
दक्षाध्वरध्वंसकाय महाकालभेदनाय
मूलाधारैकनिलयाय तत्त्वातीताय
गंगाधराय सर्वदेवाधिदेवाय
षडाश्रयाय वेदांतसाराय
त्रिवर्गसाधनायानंतकोटिब्रह्माण्डनाय
कायानंतवासुकितक्षककर्कोटकङ्खकु
लिक
पद्ममहापद्मेत्यष्टमहानागकुलभूषणाय
प्रणवस्वरूपाय चिदाकाशाय
आकाशदिक्स्वरूपायग्रहनक्षत्रमालिने
सकलाय कलंकरहिताय
सकललोकैकर्त्रे सकललोकैकभर्त्रे
सकललोकैकसंहर्त्रे सकललोकैकगुरवे
सकललोकैकसाक्षिणे
सकलनिगमगुह्याय सकल
वेदान्तपारगाय सकललोकैकवरप्रदाय
सकलकोलोकैकशंकराय शशांकशेखराय
शाश्वतनिजावासाय निराभासाय
निरामयाय निर्मलाय निर्लोभाय
निर्मदाय निश्चिंताय निरहंकाराय
निरंकुशाय निष्कलंकाय निर्गुणाय
निष्कामाय निरुपप्लवाय निरवद्याय
निरंतराय निष्कारणाय निरंतकाय
निष्प्रपंचाय नि:संगाय निर्द्वंद्वाय
निराधाराय नीरागाय निष्क्रोधाय
निर्मलाय निष्पापाय निर्भयाय
निर्विकल्पाय निर्भेदाय निष्क्रियय
निस्तुलाय नि:संशयाय निरंजनाय
निरुपमविभवायनित्यशुद्धबुद्ध
परिपूर्णसच्चिदानंदाद्वयाय
परमशांतस्वरूपाय तेजोरूपाय तेजोमयाय
जय जय रुद्रमहारौद्रभद्रावतार
महाभैरव कालभैरव कल्पांतभैरव
कपालमालाधर
खट्वांगखड्गचर्मपाशांकुशडमरुशूलचाप
बाणगदाशक्तिभिंदिपालतोमरमुसलमुद्ग
रपाशपरिघ
भुशुण्डीशतघ्नीचक्राद्यायुधभीषणकर
सहस्रमुखदंष्ट्राकरालवदनविकटाट्टहा
सविस्फारितब्रह्मांडमंडल नागेंद्रकुंडल
नागेंद्रहार नागेन्द्रवलय
नागेंद्रचर्मधरमृयुंजय त्र्यंबकपुरांतक
विश्वरूप विरूपाक्ष विश्वेश्वर
वृषभवाहन विषविभूषण विश्वतोमुख
सर्वतो रक्ष रक्ष मां ज्वल ज्वल
महामृत्युमपमृत्युभयं
नाशयनाशयचोरभयमुत्सादयोत्सादय
विषसर्पभयं शमय शमय चोरान्मारय
मारय
ममशमनुच्चाट्योच्चाटयत्रिशूलेनविदार
य कुठारेणभिंधिभिंभधि खड्गेन
छिंधि छिंधि खट्वांगेन विपोथय
विपोथय मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय
वाणै: संताडय संताडय रक्षांसि भीषय
भीषयशेषभूतानि निद्रावय
कूष्मांडवेतालमारीच
ब्रह्मराक्षसगणान्संत्रासय संत्रासय
ममाभय कुरु कुरु वित्रस्तं
मामाश्वासयाश्वासय
नरकमहाभयान्मामुद्धरसंजीवय
संजीवयक्षुत्तृड्भ्यां मामाप्याय-
आप्याय दु:खातुरं
मामानन्दयानन्दयशिवकवचेन
मामाच्छादयाच्छादयमृत्युंजय त्र्यंबक
सदाशिव नमस्ते नमस्ते नमस्ते।

।। ऋषभ उवाच ।।
इत्येतत्कवचं शैवं वरदं व्याह्रतं
मया ॥
सर्वबाधाप्रशमनं रहस्यं सर्वदेहिनाम्
॥ ३० ॥
य: सदा धारयेन्मर्त्य: शैवं
कवचमुत्तमम् ।
न तस्य जायते क्वापि भयं
शंभोरनुग्रहात् ॥ ३१ ॥
क्षीणायुअ:प्राप्तमृत्युर्वा
महारोगहतोऽपि वा ॥
सद्य:
सुखमवाप्नोति दीर्घमायुश्चविंदति ॥
३२ ॥
सर्वदारिद्र्य शमनं
सौमंगल्यविवर्धनम् ।
यो धत्ते कवचं शैवं सदेवैरपि पूज्यते
॥ ३३ ॥
महापातकसंघातैर्मुच्यते चोपपातकै: ।
देहांते मुक्तिमाप्नोति शिववर्मानुभावत:
॥ ३४ ॥
त्वमपि श्रद्धया वत्स शैवं
कवचमुत्तमम्
धारयस्व मया दत्तं सद्य:
श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ॥ ३५ ॥
॥ सूत उवाच ॥
इत्युक्त्वाऋषभो योगी तस्मै
पार्थिवसूनवे ।
ददौ शंखं महारावं खड्गं चारिनिषूदनम्
॥ ३६ ॥
पुनश्च भस्म संमत्र्य तदंगं
परितोऽस्पृशत् ।
गजानां षट्सहस्रस्य द्विगुणस्य बलं
ददौ । ३७ ॥
भस्मप्रभावात्संप्राप्तबलैश्वर्यधृतिस्
मृति: ।
स राजपुत्र: शुशुभे शरदर्क इव
श्रिया ॥ ३८ ॥
तमाह प्रांजलिं भूय: स योगी नृपनंदनम्

एष
खड्गो मया दत्तस्तपोमंत्रानुभावित:
॥ ३९ ॥
शितधारमिमंखड्गं यस्मै दर्शयसे
स्फुटम् ।
स सद्यो म्रियतेशत्रु:
साक्षान्मृत्युरपि स्वयम् ॥ ४० ॥
अस्य शंखस्य निर्ह्लादं ये
श्रृण्वंति तवाहिता: ।
ते मूर्च्छिता:
पतिष्यंति न्यस्तशस्त्रा विचेतना: ॥
४१ ॥
खड्गशंखाविमौ दिव्यौ परसैन्य
निवाशिनौ ।
आत्मसैन्यस्यपक्षाणां
शौर्यतेजोविवर्धनो ॥ ४२ ॥
एतयोश्च प्रभावेण शैवेन कवचेन च ।
द्विषट्सहस्त्रनागानां बलेन महतापि च
॥ ४३ ॥
भस्मधारणसामर्थ्याच्छत्रुसैन्यं
विजेष्यसि ।
प्राप्य सिंहासनं पित्र्यं
गोप्तासि पृथिवीमिमाम् ॥ ४४ ॥
इति भद्रायुषं सम्यगनुशास्य
समातृकम् ।
ताभ्यां पूजित: सोऽथ
योगी स्वैरगतिर्ययौ ॥ ४५ ॥

।।इति श्रीस्कंदपुराणे
एकाशीतिसाहस्त्रयां तृतीये ब्रह्मोत्तरखण्डे
श्रीशिवकवचं समाप्तम् ।।

 

 

 

 

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||●|| अथ गुप्त सप्तशती ||●||

गुप्त-सप्तशती

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सात सौ मन्त्रों की ‘श्री दुर्गा सप्तशती, का पाठ
करने से साधकों का जैसा कल्याण होता है, वैसा-
ही कल्याणकारी इसका पाठ है। यह ‘गुप्त-सप्तशती’
प्रचुर मन्त्र-बीजों के होने से आत्म-कल्याणेछु
साधकों के लिए अमोघ फल-प्रद है।

इसके पाठ का क्रम इस प्रकार है। प्रारम्भ में
‘कुञ्जिका-स्तोत्र’, उसके बाद ‘गुप्त-सप्तशती’,
तदन्तर ‘स्तवन‘ का पाठ करे।

कुञ्जिका-स्तोत्र

।।पूर्व-पीठिका-ईश्वर उवाच।।

श्रृणु देवि, प्रवक्ष्यामि कुञ्जिका-मन्त्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेन चण्डीजापं शुभं भवेत्॥1॥
न वर्म नार्गला-स्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासं च न चार्चनम्॥2॥
कुञ्जिका-पाठ-मात्रेण दुर्गा-पाठ-फलं लभेत्।
अति गुह्यतमं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥ 3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्व-योनि-वच्च पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठ-मात्रेण संसिद्धिः कुञ्जिकामन्त्रमुत्तमम्॥ 4॥

अथ मंत्र

ॐ श्लैं दुँ क्लीं क्लौं जुं सः ज्वलयोज्ज्वल ज्वल
प्रज्वल-प्रज्वल प्रबल-प्रबल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा
॥ इति मंत्रः॥

इस ‘कुञ्जिका-मन्त्र’ का यहाँ दस बार जप करे।
इसी प्रकार ‘स्तव-पाठ’ के अन्त में पुनः इस मन्त्र
का दस बार जप कर ‘कुञ्जिका स्तोत्र’ का पाठ
करे।

।।कुञ्जिका स्तोत्र मूल-पाठ।।

नमस्ते रुद्र-रूपायै, नमस्ते मधु-मर्दिनि।
नमस्ते कैटभारी च, नमस्ते महिषासनि॥
नमस्ते शुम्भहंत्रेति, निशुम्भासुर-घातिनि।
जाग्रतं हि महा-देवि जप-सिद्धिं कुरुष्व मे॥
ऐं-कारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रति-पालिका॥
क्लीं-कारी कामरूपिण्यै बीजरूपा नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्ड-घाती च यैं-कारी वर-दायिनी॥
विच्चे नोऽभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि॥
धां धीं धूं धूर्जटेर्पत्नी वां वीं वागेश्वरी तथा।
क्रां क्रीं श्रीं मे शुभं कुरु, ऐं ॐ ऐं रक्ष सर्वदा।।

ॐ ॐ ॐ-कार-रुपायै, ज्रां-ज्रां ज्रम्भाल-नादिनी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि, शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥
ह्रूं ह्रूं ह्रूं-काररूपिण्यै ज्रं ज्रं ज्रम्भाल-नादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवानि ते नमो नमः॥7॥

।।मन्त्र।।

अं कं चं टं तं पं यं शं बिन्दुराविर्भव, आविर्भव, हं
सं लं क्षं मयि जाग्रय-जाग्रय, त्रोटय-त्रोटय
दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा, खां खीं खूं खेचरी तथा॥
म्लां म्लीं म्लूं दीव्यती पूर्णा, कुञ्जिकायै
नमो नमः।।
सां सीं सप्तशती-सिद्धिं, कुरुष्व जप-मात्रतः॥
इदं तु कुञ्जिका-स्तोत्रं मंत्र-जाल-ग्रहां प्रिये।
अभक्ते च न दातव्यं, गोपयेत् सर्वदा श्रृणु।।
कुंजिका-विहितं देवि यस्तु सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिं, अरण्ये रुदनं यथा॥

। इति श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वतीसंवादे
कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम् ।

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गुप्त-सप्तशती

ॐ ब्रीं-ब्रीं-ब्रीं वेणु-हस्ते, स्तुत-सुर-
बटुकैर्हां गणेशस्य माता।
स्वानन्दे नन्द-रुपे, अनहत-निरते, मुक्तिदे मुक्ति-
मार्गे।।
हंसः सोहं विशाले, वलय-गति-हसे, सिद्ध-
देवी समस्ता।
हीं-हीं-हीं सिद्ध-लोके, कच-रुचि-विपुले, वीर-भद्रे
नमस्ते।।१
ॐ हींकारोच्चारयन्ती, मम हरति भयं, चण्ड-
मुण्डौ प्रचण्डे।
खां-खां-खां खड्ग-पाणे, ध्रक-ध्रक ध्रकिते, उग्र-रुपे
स्वरुपे।।
हुँ-हुँ हुँकांर-नादे, गगन-भुवि-तले, व्यापिनी व्योम-रुपे।
हं-हं हंकार-नादे, सुर-गण-नमिते, चण्ड-रुपे नमस्ते।।२
ऐं लोके कीर्तयन्ती, मम हरतु भयं, राक्षसान्
हन्यमाने।
घ्रां-घ्रां-घ्रां घोर-रुपे, घघ-घघ-घटिते, घर्घरे घोर-
रावे।।
निर्मांसे काक-जंघे, घसित-नख-नखा, धूम्र-नेत्रे त्रि-
नेत्रे।
हस्ताब्जे शूल-मुण्डे, कुल-कुल ककुले, सिद्ध-हस्ते
नमस्ते।।३
ॐ क्रीं-क्रीं-क्रीं ऐं कुमारी, कुह-कुह-मखिले,
कोकिलेनानुरागे।
मुद्रा-संज्ञ-त्रि-रेखा, कुरु-कुरु सततं, श्री महा-
मारि गुह्ये।।
तेजांगे सिद्धि-नाथे, मन-पवन-चले, नैव आज्ञा-
निधाने।
ऐंकारे रात्रि-मध्ये, स्वपित-पशु-जने, तत्र कान्ते
नमस्ते।।४
ॐ व्रां-व्रीं-व्रूं व्रैं कवित्वे, दहन-पुर-गते रुक्मि-
रुपेण चक्रे।
त्रिः-शक्तया, युक्त-वर्णादिक, कर-नमिते, दादिवं
पूर्व-वर्णे।।
ह्रीं-स्थाने काम-राजे, ज्वल-ज्वल ज्वलिते,
कोशिनि कोश-पत्रे।
स्वच्छन्दे कष्ट-नाशे, सुर-वर-वपुषे, गुह्य-मुण्डे
नमस्ते।।५
ॐ घ्रां-घ्रीं-घ्रूं घोर-तुण्डे, घघ-घघ घघघे
घर्घरान्याङि्घ्र-घोषे।
ह्रीं क्रीं द्रूं द्रोञ्च-चक्रे, रर-रर-रमिते, सर्व-ज्ञाने
प्रधाने।।
द्रीं तीर्थेषु च ज्येष्ठे, जुग-जुग जजुगे म्लीं पदे
काल-मुण्डे।
सर्वांगे रक्त-धारा-मथन-कर-वरे, वज्र-दण्डे
नमस्ते।।६
ॐ क्रां क्रीं क्रूं वाम-नमिते, गगन गड-गडे गुह्य-
योनि-स्वरुपे।
वज्रांगे, वज्र-हस्ते, सुर-पति-वरदे, मत्त-मातंग-
रुढे।।
स्वस्तेजे, शुद्ध-देहे, लल-लल-ललिते, छेदिते पाश-
जाले।
किण्डल्याकार-रुपे, वृष वृषभ-ध्वजे,
ऐन्द्रि मातर्नमस्ते।।७
ॐ हुँ हुँ हुंकार-नादे, विषमवश-करे, यक्ष-वैताल-
नाथे।
सु-सिद्धयर्थे सु-सिद्धैः, ठठ-ठठ-ठठठः, सर्व-
भक्षे प्रचण्डे।।
जूं सः सौं शान्ति-कर्मेऽमृत-मृत-हरे, निःसमेसं
समुद्रे।
देवि, त्वं साधकानां, भव-भव वरदे, भद्र-
काली नमस्ते।।८
ब्रह्माणी वैष्णवी त्वं, त्वमसि बहुचरा, त्वं वराह-
स्वरुपा।
त्वं ऐन्द्री त्वं कुबेरी, त्वमसि च जननी, त्वं
कुमारी महेन्द्री।।
ऐं ह्रीं क्लींकार-भूते, वितल-तल-तले, भू-तले स्वर्ग-
मार्गे।
पाताले शैल-श्रृंगे, हरि-हर-भुवने, सिद्ध-
चण्डी नमस्ते।।९
हं लं क्षं शौण्डि-रुपे, शमित भव-भये, सर्व-
विघ्नान्त-विघ्ने।
गां गीं गूं गैं षडंगे, गगन-गति-गते, सिद्धिदे सिद्ध-
साध्ये।।
वं क्रं मुद्रा हिमांशोर्प्रहसति-वदने, त्र्यक्षरे ह्सैं
निनादे।
हां हूं गां गीं गणेशी, गज-मुख-जननी,
त्वां महेशीं नमामि।।१०

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स्तवन

या देवी खड्ग-हस्ता, सकल-जन-पदा,
व्यापिनी विशऽव-दुर्गा।
श्यामांगी शुक्ल-पाशाब्दि जगण-गणिता, ब्रह्म-
देहार्ध-वासा।।
ज्ञानानां साधयन्ती, तिमिर-विरहिता, ज्ञान-दिव्य-
प्रबोधा।
सा देवी, दिव्य-मूर्तिर्प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे
प्रचण्डे।।१
ॐ हां हीं हूं वर्म-युक्ते, शव-गमन-गतिर्भीषणे भीम-
वक्त्रे।
क्रां क्रीं क्रूं क्रोध-मूर्तिर्विकृत-स्तन-मुखे, रौद्र-
दंष्ट्रा-कराले।।
कं कं कंकाल-धारी भ्रमप्ति, जगदिदं
भक्षयन्ती ग्रसन्ती-
हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे
प्रचण्डे।।२
ॐ ह्रां ह्रीं हूं रुद्र-रुपे, त्रिभुवन-नमिते, पाश-हस्ते
त्रि-नेत्रे।
रां रीं रुं रंगे किले किलित रवा, शूल-हस्ते प्रचण्डे।।
लां लीं लूं लम्ब-जिह्वे हसति, कह-कहा शुद्ध-
घोराट्ट-हासैः।
कंकाली काल-रात्रिः प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे
प्रचण्डे।।३
ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोर-रुपे घघ-घघ-घटिते घर्घराराव
घोरे।
निमाँसे शुष्क-जंघे पिबति नर-वसा धूम्र-धूम्रायमाने।।
ॐ द्रां द्रीं द्रूं द्रावयन्ती, सकल-भुवि-तले, यक्ष-
गन्धर्व-नागान्।
क्षां क्षीं क्षूं क्षोभयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-
मुण्डे प्रचण्डे।।४
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भद्र-काली, हरि-हर-नमिते, रुद्र-
मूर्ते विकर्णे।
चन्द्रादित्यौ च कर्णौ, शशि-मुकुट-
शिरो वेष्ठितां केतु-मालाम्।।
स्त्रक्-सर्व-चोरगेन्द्रा शशि-करण-
निभा तारकाः हार-कण्ठे।
सा देवी दिव्य-मूर्तिः, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे
प्रचण्डे।।५
ॐ खं-खं-खं खड्ग-हस्ते, वर-कनक-निभे सूर्य-
कान्ति-स्वतेजा।
विद्युज्ज्वालावलीनां, भव-निशित महा-
कर्त्रिका दक्षिणेन।।
वामे हस्ते कपालं, वर-विमल-सुरा-पूरितं धारयन्ती।
सा देवी दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे
प्रचण्डे।।६
ॐ हुँ हुँ फट् काल-रात्रीं पुर-सुर-मथनीं धूम्र-
मारी कुमारी।
ह्रां ह्रीं ह्रूं हन्ति दुष्टान् कलित किल-किला शब्द
अट्टाट्टहासे।।
हा-हा भूत-प्रभूते, किल-किलित-मुखा,
कीलयन्ती ग्रसन्ती।
हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे
प्रचण्डे।।७
ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं कपालीं परिजन-
सहिता चण्डि चामुण्डा-नित्ये।
रं-रं रंकार-शब्दे शशि-कर-धवले काल-कूटे दुरन्ते।।
हुँ हुँ हुंकार-कारि सुर-गण-नमिते, काल-कारी विकारी।
त्र्यैलोक्यं वश्य-कारी, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे
प्रचण्डे।।८
वन्दे दण्ड-प्रचण्डा डमरु-डिमि-डिमा, घण्ट टंकार-
नादे।
नृत्यन्ती ताण्डवैषा थथ-थइ विभवैर्निर्मला मन्त्र-
माला।।
रुक्षौ कुक्षौ वहन्ती, खर-खरिता रवा चार्चिनि प्रेत-
माला।
उच्चैस्तैश्चाट्टहासै, हह हसित रवा, चर्म-
मुण्डा प्रचण्डे।।९
ॐ त्वं ब्राह्मी त्वं च रौद्री स च शिखि-गमना त्वं
च देवी कुमारी।
त्वं चक्री चक्र-हासा घुर-घुरित रवा, त्वं वराह-
स्वरुपा।।
रौद्रे त्वं चर्म-मुण्डा सकल-भुवि-तले संस्थिते
स्वर्ग-मार्गे।
पाताले शैल-श्रृंगे हरि-हर-नमिते देवि चण्डी नमस्ते।।
१०
रक्ष त्वं मुण्ड-धारी गिरि-गुह-विवरे निर्झरे पर्वते
वा।
संग्रामे शत्रु-मध्ये विश विषम-विषे संकटे कुत्सिते
वा।।
व्याघ्रे चौरे च सर्पेऽप्युदधि-भुवि-तले वह्नि-मध्ये च
दुर्गे।
रक्षेत् सा दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं मुण्ड-चण्डे
प्रचण्डे।।११
इत्येवं बीज-मन्त्रैः स्तवनमति-शिवं पातक-व्याधि-
नाशनम्।
प्रत्यक्षं दिव्य-रुपं ग्रह-गण-मथनं मर्दनं
शाकिनीनाम्।।
इत्येवं वेद-वेद्यं सकल-भय-हरं मन्त्र-शक्तिश्च
नित्यम्।
मन्त्राणां स्तोत्रकं यः पठति स लभते
प्रार्थितां मन्त्र-सिद्धिम्।।१२
चं-चं-चं चन्द्र-हासा चचम चम-चमा चातुरी चित्त-
केशी।
यं-यं-यं योग-माया जननि जग-हिता योगिनी योग-
रुपा।।
डं-डं-डं डाकिनीनां डमरुक-सहिता दोल हिण्डोल
डिम्भा।
रं-रं-रं रक्त-वस्त्रा सरसिज-नयना पातु
मां देवि दुर्गा।।१३।।

   !! श्री आदिशक्तये नमः !!

 

 

 

 

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|| नारायण कवच ||

श्री नारायण कवच

न्यासः- सर्वप्रथम श्रीगणेश जी तथा भगवान
नारायण को नमस्कार करके नीचे लिखे प्रकार से
न्यास करें।

अगं-न्यासः-
ॐ ॐ नमः — पादयोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व
अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों पैरों का स्पर्श
करें)।
ॐ नं नमः — जानुनोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व
अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर
दोनों घुटनों का स्पर्श करें )।
ॐ मों नमः — ऊर्वोः (दाहिने हाथ
की तर्जनी अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर
दोनों पैरों की जाँघ का स्पर्श करें)।
ॐ नां नमः — उदरे ( दाहिने हाथ
की तर्जनी तथा अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर पेट
का स्पर्श करे )
ॐ रां नमः — हृदि ( मध्यमा-अनामिका-तर्जनी से
हृदय का स्पर्श करें )
ॐ यं नमः – उरसि ( मध्यमा- अनामिका-तर्जनी से
छाती का स्पर्श करे )
ॐ णां नमः — मुखे ( तर्जनी – अँगुठे के संयोग से
मुख का स्पर्श करे )
ॐ यं नमः — शिरसि ( तर्जनी -मध्यमा के संयोग
से सिर का स्पर्श करे )
कर-न्यासः-
ॐ ॐ नमः — दक्षिणतर्जन्याम् ( दाहिने अँगुठे से
दाहिने तर्जनी के सिरे का स्पर्श करे )
ॐ नं नमः —-दक्षिणमध्यमायाम् ( दाहिने अँगुठे से
दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली का ऊपर वाला पोर
स्पर्श करे )
ॐ मों नमः —दक्षिणानामिकायाम् ( दहिने अँगुठे से
दाहिने हाथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श
करे )
ॐ भं नमः —-दक्षिणकनिष्ठिकायाम् (दाहिने अँगुठे
से हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श
करे )
ॐ गं नमः —-वामकनिष्ठिकायाम् ( बाँये अँगुठे से
बाँये हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श
करे )
ॐ वं नमः —-वामानिकायाम् ( बाँये अँगुठे से बाँये
हाँथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ तें नमः —-वाममध्यमायाम् ( बाँये अँगुठे से बाये
हाथ की मध्यमा का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ वां नमः —वामतर्जन्याम् ( बाँये अँगुठे से बाँये
हाथ की तर्जनी का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ सुं नमः —-दक्षिणाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( दाहिने
हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे
का ऊपरवाला पोर छुए )
ॐ दें नमः —–दक्षिणाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( दाहिने
हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे
का नीचे वाला पोर छुए )
ॐ वां नमः —–वामाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( बाँये हाथ
की चारों अँगुलियों से बाँये अँगुठे के ऊपरवाला पोर
छुए )
ॐ यं नमः ——वामाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( बाँये हाथ
की चारों अँगुलियों से बाँये हाथ के अँगुठे का नीचे
वाला पोर छुए )

विष्णुषडक्षरन्यासः-

ॐ ॐ नमः ————हृदये ( तर्जनी –
मध्यमा एवं अनामिका से हृदय का स्पर्श करे )
ॐ विं नमः ————-मूर्ध्नि ( तर्जनी मध्यमा के
संयोग सिर का स्पर्श करे )
ॐ षं नमः —————भ्रुर्वोर्मध्ये ( तर्जनी-
मध्यमा से दोनों भौंहों का स्पर्श करे )
ॐ णं नमः —————शिखायाम् ( अँगुठे से
शिखा का स्पर्श करे )
ॐ वें नमः —————नेत्रयोः ( तर्जनी -
मध्यमा से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे )
ॐ नं नमः —————सर्वसन्धिषु ( तर्जनी –
मध्यमा और अनामिका से शरीर के सभी जोड़ों —
जैसे – कंधा, घुटना, कोहनी आदि का स्पर्श करे )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्राच्याम् (पूर्व की ओर
चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् –आग्नेय्याम् ( अग्निकोण में
चुटकी बजायें )
ॐ मः अस्त्राय फट् — दक्षिणस्याम् ( दक्षिण
की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — नैऋत्ये (नैऋत्य कोण में
चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्रतीच्याम्( पश्चिम
की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — वायव्ये ( वायुकोण में
चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — उदीच्याम्( उत्तर की ओर
चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऐशान्याम् (ईशानकोण में
चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऊर्ध्वायाम् ( ऊपर
की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — अधरायाम् (नीचे की ओर
चुटकी बजाएँ )

श्री हरिः
अथ श्रीनारायणकवच

image

।।राजोवाच।।
यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्।।१
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्।
यथाssततायिनः शत्रून् येन गुप्तोsजयन्मृधे।।२
राजा परिक्षित ने पूछाः भगवन् ! देवराज इंद्र ने
जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओं
की चतुरङ्गिणी सेना को खेल-खेल में अनायास
ही जीतकर त्रिलोकी की राज लक्ष्मी का उपभोग
किया, आप उस नारायण कवच को सुनाइये और यह
भी बतलाईये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर
रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर
विजय प्राप्त की ।।१-२
।।श्रीशुक उवाच।।
वृतः पुरोहितोस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु।।३
श्रीशुकदेवजी ने कहाः परीक्षित् ! जब देवताओं ने
विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र
के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने नारायण कवच
का उपदेश दिया तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण
करो ।।३
विश्वरूप उवाचधौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्
मुखः।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः।।४
नारायणमयं वर्म संनह्येद् भय आगते।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरूदरे हृद्यथोरसि।।५
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा।।६
विश्वरूप ने कहा – देवराज इन्द्र ! भय का अवसर
उपस्थित होने पर नारायण कवच धारण करके अपने
शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिए उसकी विधि यह है
कि पहले हाँथ-पैर धोकर आचमन करे, फिर हाथ में
कुश की पवित्री धारण करके उत्तर मुख करके बैठ
जाय इसके बाद कवच धारण पर्यंत और कुछ न
बोलने का निश्चय करके पवित्रता से “ॐ
नमो नारायणाय” और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
इन मंत्रों के द्वारा हृदयादि अङ्गन्यास
तथा अङ्गुष्ठादि करन्यास करे पहले “ॐ
नमो नारायणाय” इस अष्टाक्षर मन्त्र के ॐ
आदि आठ अक्षरों का क्रमशः पैरों, घुटनों, जाँघों,
पेट, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और सिर में न्यास करे
अथवा पूर्वोक्त मन्त्र के यकार से लेकर ॐ कार
तक आठ अक्षरों का सिर से आरम्भ कर उन्हीं आठ
अङ्गों में विपरित क्रम से न्यास करे ।।४-६
करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादियकारन्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु।।७
तदनन्तर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस
द्वादशाक्षर -मन्त्र के ॐ आदि बारह
अक्षरों का दायीं तर्जनी से बाँयीं तर्जनी तक
दोनों हाँथ की आठ अँगुलियों और दोनों अँगुठों की दो-
दो गाठों में न्यास करे।।७
न्यसेद् हृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत्।।८
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः।।९
सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्।
ॐ विष्णवे नम इति ।।१०
फिर “ॐ विष्णवे नमः” इस मन्त्र के पहले के पहले
अक्षर ‘ॐ’ का हृदय में, ‘वि’ का ब्रह्मरन्ध्र , में
‘ष’ का भौहों के बीच में, ‘ण’ का चोटी में, ‘वे’
का दोनों नेत्रों और ‘न’ का शरीर की सब गाँठों में
न्यास करे तदनन्तर ‘ॐ मः अस्त्राय फट्’ कहकर
दिग्बन्ध करे इस प्रकर न्यास करने से इस
विधि को जानने वाला पुरूष मन्त्रमय हो जाता है ।।
८-१०
आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत ।।११
इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी,
ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण इष्टदेव भगवान्
का ध्यान करे और अपने को भी तद् रूप ही चिन्तन
करे तत्पश्चात् विद्या, तेज, और तपः स्वरूप इस
कवच का पाठ करे ।।११
ॐ हरिर्विदध्यान्मम
सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापाशान्
दधानोsष्टगुणोsष्टबाहुः ।।१२
भगवान् श्रीहरि गरूड़जी के पीठ पर अपने चरणकमल
रखे हुए हैं,
अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं
आठ हाँथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण,
धनुष, और पाश (फंदा) धारण किए हुए हैं वे
ही ओंकार स्वरूप प्रभु सब प्रकार से सब ओर से
मेरी रक्षा करें।।१२
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य
पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोsव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु
विश्वरूपः ।।१३
मत्स्यमूर्ति भगवान् जल के भीतर जलजंतुओं से और
वरूण के पाश से मेरी रक्षा करें माया से
ब्रह्मचारी रूप धारण करने वाले वामन भगवान् स्थल
पर और विश्वरूप श्री त्रिविक्रमभगवान् आकाश में
मेरी रक्षा करें 13
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु
प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च
गर्भाः ।।१४
जिनके घोर अट्टहास करने पर सब दिशाएँ गूँज
उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियों के गर्भ गिर
गये थे, वे दैत्ययुथपतियों के शत्रु भगवान् नृसिंह
किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानों में
मेरी रक्षा करें ।।१४
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो
वराहः।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोsव्याद्
भरताग्रजोsस्मान् ।।१५
अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठा लेने वाले
यज्ञमूर्ति वराह भगवान् मार्ग में, परशुराम
जी पर्वतों के शिखरों और लक्ष्मणजी के सहित
भरत के बड़े भाई भगावन् रामचंद्र प्रवास के समय
मेरी रक्षा करें ।।१५
मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च
हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद्
गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ।।१६
भगवान् नारायण मारण – मोहन आदि भयंकर
अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से
मेरी रक्षा करें ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर
भगवान् दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और
त्रिगुणाधिपति भगवान् कपिल कर्मबन्धन से
मेरी रक्षा करें ।।१६
सनत्कुमारो वतु
कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात्
कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ।।१७
परमर्षि सनत्कुमार कामदेव से, हयग्रीव भगवान्
मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार
आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद
सेवापराधों से और भगवान् कच्छप सब प्रकार के
नरकों से मेरी रक्षा करें ।।१७
धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद्
भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात्
क्रोधवशादहीन्द्रः ।।१८
भगवान् धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्र भगवान्
ऋषभदेव सुख-दुःख आदि भयदायक द्वन्द्वों से,
यज्ञ भगवान् लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत
कष्टों से और श्रीशेषजी क्रोधवशनामक सर्पों के
गणों से मेरी रक्षा करें ।।१८
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात्
प्रमादात्।
कल्किः कले कालमलात् प्रपातु
धर्मावनायोरूकृतावतारः ।।१९
भगवान् श्रीकृष्णद्वेपायन व्यासजी अज्ञान से
तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से
मेरी रक्षा करें धर्म-रक्षा करने वाले महान अवतार
धारण करने वाले भगवान् कल्कि पाप-बहुल कलिकाल
के दोषों से मेरी रक्षा करें ।।१९
मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द
आसङ्गवमात्तवेणुः।
नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने
विष्णुररीन्द्रपाणिः ।।२०
प्रातःकाल भगवान् केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन
चढ़ जाने पर भगवान् गोविन्द अपनी बांसुरी लेकर,
दोपहर के पहले भगवान् नारायण अपनी तीक्ष्ण
शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान् विष्णु चक्रराज
सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें ।।२०
देवोsपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु
माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोsवतु
पद्मनाभः ।।२१
तीसरे पहर में भगवान् मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष
लेकर मेरी रक्षा करें सांयकाल में
ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद
हृषिकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्ध रात्रि के
समय अकेले भगवान् पद्मनाभ मेरी रक्षा करें ।।२१
श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष
ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान्
कालमूर्तिः ।।२२
रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि,
उषाकाल में खड्गधारी भगवान् जनार्दन, सूर्योदय से
पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में
कालमूर्ति भगवान् विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें ।।२२
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद्
भगवत्प्रयुक्तम्।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमासु कक्षं
यथा वातसखो हुताशः ।।२३
सुदर्शन ! आपका आकार चक्र ( रथ के पहिये )
की तरह है आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन
अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान्
की प्रेरणा से सब ओर घूमते रहते हैं जैसे आग वायु
की सहायता से सूखे घास-फूस को जला डालती है,
वैसे ही आप हमारी शत्रुसेना को शीघ्र से शीघ्र
जला दीजिये, जला दीजिये ।।२३
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय
चूर्णयारीन् ।।२४
कौमुद की गदा ! आपसे छूटने
वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य
है आप भगवान् अजित की प्रिया हैं और मैं
उनका सेवक हूँ इसलिए आप कूष्माण्ड, विनायक,
यक्ष, राक्षस, भूत और
प्रेतादि ग्रहों को अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये
तथा मेरे शत्रुओं को चूर – चूर कर दिजिये ।।२४
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय
कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ।।२५
शङ्खश्रेष्ठ ! आप भगवान् श्रीकृष्ण के फूँकने से
भयंकर शब्द करके मेरे शत्रुओं का दिल
दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका,
पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने
प्राणियों को यहाँ से तुरन्त भगा दीजिये ।।२५
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम
छिन्धि छिन्धि।
चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम्
२६
भगवान् की श्रेष्ठ तलवार ! आपकी धार बहुत
तीक्ष्ण है आप भगवान् की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं
को छिन्न-भिन्न कर दिजिये। भगवान्
की प्यारी ढाल ! आपमें सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं
आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आँखे बन्द कर
दिजिये और उन्हें सदा के लिये अन्धा बना दीजिये ।।
२६
यन्नो भयं ग्रहेभ्यो भूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा ।।२७
सर्वाण्येतानि भगन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ।।
२८
सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छल तारे ) आदि केतु,
दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ोंवाले
हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से
हमें जो-जो भय हो और जो हमारे मङ्गल के
विरोधी हों – वे सभी भगावान् के नाम, रूप
तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट
हो जायें ।।२७-२८
गरूड़ो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ।।२९
बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से
जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरूड़
और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से
हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें।।२९
सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धिन्द्रियमनः प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ।।३०
श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ
पार्षद हमारी बुद्धि , इन्द्रिय , मन और
प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ।।३०
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सद्सच्च यत्।
सत्यनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपाद्रवाः ।।३१
जितना भी कार्य अथवा कारण रूप जगत है, वह
वास्तव में भगवान् ही है इस सत्य के प्रभाव से
हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायें ।।३१
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुद्धलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ।।
३२
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ।।३३
जो लोग ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर
चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान् का स्वरूप समस्त
विकल्पों से रहित है-भेदों से रहित हैं फिर भी वे
अपनी माया शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप
नामक शक्तियों को धारण करते हैं यह बात निश्चित
रूप से सत्य है इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक
भगवान् श्रीहरि सदा -सर्वत्र सब स्वरूपों से
हमारी रक्षा करें ।।३२-३३
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान्
नारसिंहः।
प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन ग्रस्तसमस्ततेजाः ।।३४
जो अपने भयंकर अट्टहास से सब लोगों के भय
को भगा देते हैं और अपने तेज से सबका तेज ग्रस
लेते हैं, वे भगवान् नृसिंह दिशा -विदिशा में, नीचे -
ऊपर, बाहर-भीतर – सब ओर से हमारी रक्षा करें
।।३४
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारयणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ।।३५
देवराज इन्द्र ! मैने तुम्हें यह नारायण कवच
सुना दिया है इस कवच से तुम अपने को सुरक्षित
कर लो बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य –
यूथपतियों को जीत कर लोगे ।।३५
एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ।।
३६
इस नारायण कवच को धारण करने वाला पुरूष
जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता है अथवा पैर से
छू देता है, तत्काल समस्त भयों से से मुक्त
हो जाता है 36
न कुतश्चित भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ।।
३७
जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे
राजा, डाकू, प्रेत, पिशाच आदि और बाघ
आदि हिंसक जीवों से कभी किसी प्रकार का भय
नहीं होता ।।३७
इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विजः।
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरूधन्वनि ।।३८
देवराज! प्राचीनकाल की बात है, एक कौशिक
गोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके
योगधारणा से अपना शरीर मरूभूमि में त्याग दिया ।।
३८
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथः स्त्रीर्भिवृतो यत्र द्विजक्षयः ।।
३९
जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उसके उपर से
एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के
साथ विमान पर बैठ कर निकले ।।३९
गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाक् शिराः।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात्
।।४०
वहाँ आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमान सहित
आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़े इस घटना से उनके
आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्हें बालखिल्य
मुनियों ने बतलाया कि यह नारायण कवच धारण करने
का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मण देव
की हड्डियों को ले जाकर
पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और
फिर स्नान करके वे अपने लोक को चले गये ।।४०
।।श्रीशुक उवाच।।
य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ।।४१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं – परिक्षित् जो पुरूष इस
नारायण कवच को समय पर सुनता है और जो आदर
पूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने
सभी प्राणी आदर से झुक जाते हैं और वह सब
प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है ।।४१
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्यऽमृधेसुरान् ।।४२
परीक्षित् ! शतक्रतु इन्द्र ने आचार्य
विश्वरूपजी से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके
रणभूमि में असुरों को जीत लिया और वे
त्रैलोक्यलक्ष्मी का उपभोग करने लगे 42
।।इति श्रीनारायणकवचं सम्पूर्णम्।।
( श्रीमद्भागवत स्कन्ध 6 , अ। 8 )

 

 

 

 

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||●|| अथ पञ्च मुखी हनुमत् कवचम् ||●||

|| पंचमुखी हनुमत्कवचम ||

ॐ श्री हरिगुरुभ्यो नम:

॥ हरि: ॐ ॥

अस्य
श्रीपंचमुखी वीर हनुमत्कवच स्त्रोत्र मंत्रस्य ॥
ब्रह्माऋषी: ॥ गायत्री छंद: ॥
पंचमुखी श्रीरामचंद्ररूपी परमात्मा देवता ॥
ऱ्हां बीजम् ऱ्हीं शक्ति: चंद्र इति कीलकं ॥
पंचमुखांतर्गत श्रीरामचंद्ररूपी परमात्मा प्रसाद
सिद्ध्यर्थे जपे विनियोग: ॥

॥ अथ अंगुली न्यास: ॥

ॐ ऱ्हां अंगुष्ठाभ्यां नम: ॥ ॐ ऱ्हीं तर्जनीभ्यां नम:
॥ ॐ ऱ्हूं मध्यमाभ्यां नम: ॥ ॐ ऱ्हैं
अनामिकाभ्यां नम: ॥ ॐ ऱ्हौं कनिष्ठिकाभ्यां नम: ॥
ॐ ऱ्ह: करतल करपृष्ठाभ्यां नम: ॥ इति करन्यास:

॥ अथ हृदयादि न्यास: ॥

ॐ ऱ्हां हृदयाय नम: ॥ ॐ ऱ्हीं शिरसे स्वाहा ॥ ॐ
ऱ्हू शिखायै वषट् ॥ ॐ ऱ्हैं कवचायहुम् ॥ ॐ
ऱ्हौं नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ ॐ ऱ्ह: अस्त्राय फट् ॥
इति हृदयन्यास: ॥ ॐ भूर्भुवस्वरोम् ॥

॥ अथ दिग्बंध: ॥
॥ ॐ कँ खँ घँ गँ ङँ चँ छँ जँ झँ ञँ टँ ठँ डँ ढँ णँ तँ
थँ दँ धँ नँ पँ फँ बँ भँ मँ यँ रँ लँ वँ शँ षँ सँ हँ ळँ
क्षँ स्वाहा ॥ इति दिग्बंध: ॥

॥ अथ ध्यानम् ॥

वंदे वानर नारसिंह खगराट् क्रोडागाश्ववक्त्रान्वितं
। दिव्यालंकरणं त्रिपंचनयनं दैदीप्यमानं ऋचा ।
हस्ताब्जैरसिखेट पुस्तकं सुधाकुंभं कुशादीन् हलान् ।
खट्वागं कनिभूरुहं दशभुजं सर्वारिदर्पापहम् ॥१॥
पंचवक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम् ।
दशभिर्बाहुभिर्युक्तं सर्व कामार्थ सिद्धिदम् ॥२॥
पूर्वे तु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
दंष्ट्रा कराल वदनं भृकुटीकुटिलेक्षणम् ॥३॥
अन्यं तु दक्षिणे वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतं ।
अत्युग्रतेजोज्वलितं भीषणं भयनाशनम् ॥४॥
पश्चिमे गारुडं वक्त्र वज्रतुंडं महाबलं । सर्व रोग
प्रशमनं विषभूतादिकृंतनम् ॥५॥
उत्तरे सूकरं वक्त्र कृष्णादित्यं महोज्वलं । पाताल
सिद्धिदं नृणां ज्वर रोगादि नाशनम् ॥६॥
ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवांतकरंपरं । येन वक्त्रेण
विप्रेंद्र सर्व विद्याविनिर्ययु: ॥७॥
एतत्पंचमुखं तस्य ध्यायतोन भयंकरं । खड्गं
त्रिशूलं खट्वागं परश्वंकुशपर्वतम् ॥८॥
खेटांसीनि-पुस्तकं च सुधा कुंभ हलं तथा ।
एतान्यायुध जातानि धारयंतं भजामहे ॥९॥
प्रेतासनोपविष्टंतुं दिव्याभरणभूषितं ।
दिव्यमालांबरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् ॥१०॥
ॐ मर्कटेश महोत्साह सर्वशोकविनाशक ।
शत्रून्संहर मां रक्षश्रियं दापयमे प्रभो ॥११॥
सर्वैश्वर्यमयं देवमनंतं विश्वतोमुखम् । एवं ध्यायेत्
पंचमुखं सर्व काम फल प्रदं ॥१२॥
पंचास्यमच्युतमनेकविचित्रवीर्यं । श्रीशंख चक्र
रमणीय भुजाग्रदेशम् ॥
पीतांबरं मुकुट कुंडल नूपुरांगं । उद्द्योतितंकपिवरं
हृदि भावयामि ॥१३॥
चंद्रार्धंचरणावरविंद युगुलं कौपीनमौंजीधर ।
नाभ्यांवैकटीसूत्रबद्ध वसनं यज्ञोपवीतं शुभम् ।
हस्ताभ्यामवलंब्यचांजलिपुटं हारावलिं कुंडलम् ।
बिभ्रद्वीर्यशिखं प्रसन्नवदनं विद्याजनेयं भजे ॥
१४॥
ॐ मर्कटेश महोत्साह सर्वशोकविनाशक ।
शत्रून्संहर मां रक्षश्रियं दापयमे प्रभो ॥१५॥
इति ध्यानम् ॥

॥ अथ प्रयोग मंत्र: ॥

॥ ॐ हरिमर्कट महामर्कटाय ॐ वँ वँ वँ वँ वँ वँ
वौषट् हुंफट् घेघेघे स्वाहा (कपिमुखे) ॥
ॐ हरि मर्कट महामर्कटाय ॐ फँ फँ फँ फँ फँ फँ
हुंफट् घेघेघे स्वाहा (नारसिंहमुखे) ॥
ॐ हरि मर्कट महामर्कटाय ॐ खें खें खें खें खें खें
हुंफट् घेघेघे स्वाहा (गरूडमुखे) ॥
ॐ हरि मर्कट महामर्कटाय ॐ ठँ ठँ ठँ ठँ ठँ ठँ
हुंफट् घेघेघे स्तंभनाय स्वाहा (वराहमुखे) ॥
ॐ हरि मर्कट महामर्कटाय ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
हुंफट् घेघेघे आकर्षण सप्तकाय स्वाहा (हयमुखे) ॥
ॐ हरि मर्कट महामंत्रमिदं
परिलिख्यति लिख्यति भूमितले ॥
यदि नश्यति नश्यति वामकरे
परिमुंचति मुंचति श्रृंखलिका
॥ इति प्रयोगमंत्र: ॥

॥ॐ अथ मूलमंत्र: ॥

॥ ॐ हरिमर्कट महामर्कटाय हुंफट् घेघेघे स्वाहा ॥
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वे कपिमुखाय ॐ
श्रीवीरहनुमते ॐ ठँ ठँ ठँ ठँ ठँ सकलशत्रुविनाशाय
सर्वशत्रुसंहारणाय महाबलाय ॥ हुंफट् घेघेघेघेघेघे
स्वाहा ॥१॥
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिण करालवदन
श्रीनारसिंहमुखाय ॐ हँ हँ हँ हँ हँ हँ
सकलभूतप्रेतदमनाय ब्रह्महत्यासमंध
बाधानिवारणाय महाबलाय हुंफट् घेघेघेघेघेघे स्वाहा ॥
२॥
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिमे वीरगरुडमुखाय
ॐ श्रीवीरहनुमते ॐ मँ मँ मँ मँ मँ मँ महारुद्राय
सकल रोगविषपरिहाराय हुंफट् घेघेघेघेघेघे स्वाहा ॥
३॥
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय उत्तरे आदिवराहमुखाय
ॐ श्रीवीरहनुमते ॐ लँ लँ लँ लँ लँ लँ
लक्ष्मणप्राणदात्रे लंकापुरीदाहनाय सकल
संपत्करायपुत्रपौत्राद्यभिवृद्धिकराय हुंफट्
घेघेघेघेघेघे स्वाहा ॥४॥
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय उर्ध्वदिशे हयग्रीवमुखाय
ॐ श्रीवीरहनुमते ॐ रूँ रूँ रूँ रूँ रूँ रूँ रुद्रमूर्तये
सकललोक वशीकरणाय वेदविद्या स्वरूपिणे हुंफट्
घेघेघेघेघेघे स्वाहा ॥५॥
इति मूलमंत्र: ॥

॥ हनुमत्कवचम् ॥

॥ अथ कवच प्रारंभ: ॥

ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय हुंफट्
घेघेघेघेघेघे स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते श्रीवीरहनुमते
प्रभवपराक्रमाय अक्रांताय सकल दिग्मंडलाय ।
शोभिताननाय । धवलोकृतवज्रदेहाय जगतचिंतिताय ।
रुद्रावताराय । लंकापुरी दहनाय । उदधिलंघनाय ।
सेतुबंधनाय । दशकंठ शिराक्रांतनाय । सीताऽऽ
श्वासनाय । अनंतकोटीब्रह्मांडनायकाय । महाबलाय
। वायुपुत्राय । अंजनीदेविगर्भसंभूताय ।
श्रीरामलक्ष्मण आनंदकराय । कपिसैन्य प्रियकराय
। सुग्रीव सहायकारण कार्य साधकाय ।
पर्वतोत्पातनाय । कुमार ब्रह्म चारिणे गंभीर
शब्दोदयाय । ॐ ऱ्हीं क्लीं सर्व दुष्ट
ग्रहनिवारणाय । सर्वरोग ज्वरोच्चाटनाय ।
डाकिनीशाकिनीविध्वंसनाय ॐ श्रीं ऱ्हीं हुंफट् घेघेघे
स्वाहा ॥६॥
ॐ नमो भगवते श्रीवीरहनुमते महाबलाय । सर्वदोष
निवारणाय । सर्व दुष्ट ग्रहरोगानुच्याटनाय । सर्व
भूतमंडलप्रेतमंडल सर्व पिशाच मंडलादि सर्व
दुष्टमंडलोच्चाटनाय । ॐ ऱ्हीं ऱ्हैं हुंफट् घेघेघे
स्वाहा ॥७॥
ॐ नमो भगवते श्रीवीरहनुमते सर्व भूतज्वरं सर्व
प्रेतज्वरं एकाहिक द्व्याहिक त्र्याहिक चातुर्थिक
संतप्त विषमज्वर गुप्तज्वर तापज्वर शीतज्वर
माहेश्वरीज्वर वैष्णवीज्वर सर्वज्वरान्
छिन्धि छिन्धि भिंन्धि भिंन्धि यक्ष राक्षस
ब्रह्मराक्षसान् भूत वेताळप्रेतपिशाच्चान्
उच्चाट्योचाट्य । ॐ ऱ्हां ऱ्हीं ऱ्हैं हुं फट् घेघेघे
स्वाहा ॥८॥
ॐ नमो भगवते श्रीवीरहनुमते नम: । ॐ ऱ्हां ऱ्हीं ऱ्हं
ऱ्हैं ऱ्हौं ऱ्ह: । आह आह असई असई एहिएहि ॐ ॐ
हों हों हुं हुं फट् घेघेघे स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते
श्रीवीरहनुमते पवनात्मजाय
डाकिनी शाकिनी मोहिनी नि:शेषनिरसनाय सर्पविषं
निर्विषं कुरु निर्विषं कुरु ॥ हारय हारय हुंफट् घेघेघे
स्वाहा ॥९॥
ॐ नमो भगवते श्रीवीरहनुमते सिंहशरभ
शार्दूलगंडभेरूड पुरूषामृगाणां उपद्रव निरसनायाक्रमणं
निरसनायाक्रमणं कुरू । सर्वरोगान् निवारय निवारय
आक्रोशय आक्रोशय । शत्रून् मर्दय मर्दय उन्माद
भयं छिन्धि छिन्धि भिंन्धि भिंन्धि । छेदय छेदय
मारय मारय शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय
ज्वालय प्रहारय प्रहारय सकल रोगान् छेदय छेदय ।
ॐ ऱ्हीं ऱ्हूं हुंफट् घेघेघे स्वाहा ॥१०॥
ॐ नमो भगवते श्रीवीरहनुमते सर्व रोग दुष्टग्रहान्
उच्चाट्य उच्चाट्य परबलान् क्षोभय क्षोभय मम
सर्व कार्याणि साधय साधय श्रृंखला बंधनं मोक्षय
मोक्षय कारागृहादिभ्य: मोचय मोचय ॥११॥
शिर:शूल कर्णशूलाक्षिशूल कुक्षिशूल
पार्श्वशूलादि महारोगान् निवारय निवारय ॥ सर्व
शत्रुकुलं संहारय संहारय ॥१२॥
नागपाशं निर्मूलय निर्मूलय । ॐ
अनंतवासुकीतक्षककर्कोटक
कालगुलिकयपद्ममहापद्मकुमुदजलचर
रात्रिंचरदिवाचरादि सर्व विषं निर्विषं कुरु निर्विषं
कुरु ॥१३॥
सर्व रोग निवारणं कुरु निवारणं कुरु । सर्व
राजसभा मुख स्तंभनं कुरु स्तंभनं कुरु । सर्वराजभयं
चोरभयं अग्निभयं प्रशमनं कुरु प्रशमनं कुरु ॥१४॥
सर्व परयंत्र परमंत्र परतंत्र परविद्या प्राकट्यं
छेदय छेदय संत्रासय संत्रासय । मम सर्व
विद्यां प्रगट्य प्रगट्य पोषय पोषय सर्वारिष्टं
शामय शामय । सर्व शत्रून् संहारय संहारय ॥१५॥
सर्व रोग पिशाश्चबाधा निवारय निवारय । असाध्य
कार्यं साधय साधय । ॐ ऱ्हां ऱ्हीं ऱ्हूं ऱ्हैं ऱ्हौं ऱ्ह:
हुंफट् घेघेघे स्वाहा ॥१६॥
य इदं कवचं नित्यं य: पठेत्प्रयतो नर: । एकवारं
जपेनित्यं सर्व शत्रुविनाशनम् । द्विवारं तु
जपेन्नित्यं सर्व शत्रुवशीकरम् । त्रिवारं य:
पठेनित्यं सर्व संपत्करं शुभं । चतुर्वारं पठेनित्यं
सर्व रोग निवारणम् । पंचवारं पठेनित्यं
पुत्रपौत्रप्रवर्धनं । षड्वारं तु पठेनित्यं सर्व देव
वशीकरम् । सप्तवारं पठेनित्यं सर्व सौभाग्यदायकं
। अष्टवारं पठेनित्यं इष्ट कामार्थ सिद्धिदं ।
नववारं सप्तकेन सर्व राज्य वशीकरम् । दशवारं
सप्तकयुगं त्रिकाल ज्ञानदर्शनं । दशैक वारं पठणात्
इमं मंत्रं त्रिसप्तकं । स्वजनैस्तु
समायुक्तो त्रैलोक्य विजयी भवेत् । सर्वरोगान्
सर्वबाधान् । सर्व भूत प्रेतपिशाच ब्रह्मराक्षस
वेताल ब्रह्महत्यादि संबंध सकलबाधान् निवारय
निवारय । हुंफट् घेघेघे स्वाहा । कवच स्मरणादेवं
महाफलमवाप्नुयात् । पूजाकाले पठेद्यस्तु सर्व
कार्यार्थ सिद्धिदं ।

इति श्रीसुदर्शन संहितायां रुद्रयामले अथर्वण
रहस्यं श्रीसीताराम मनोहर
पंचमुखी श्रीवीरहनुमत्कवचस्त्रोत्रंसंपूर्णम् ।।

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

 

 

 

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|| श्री महा विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र ||

श्री महा-विपरीत-
प्रत्यंगिरा स्तोत्र
~×~×~×~×~×
श्री महा-विपरीत-प्रत्यंगिरा स्तोत्र
नमस्कार मन्त्रः- श्रीमहा-विपरीत-
प्रत्यंगिरा-काल्यै नमः।
।।पूर्व-पीठिका-महेश्वर उवाच।।
श्रृणु देवि, महा-विद्यां, सर्व-सिद्धि-
प्रदायिकां।
यस्याः विज्ञान-मात्रेण, शत्रु-
वर्गाः लयं गताः।।
विपरीता महा-काली, सर्व-भूत-भयंकरी।
यस्याः प्रसंग-मात्रेण, कम्पते च
जगत्-त्रयम्।।
न च शान्ति-प्रदः कोऽपि, परमेशो न
चैव हि।
देवताः प्रलयं यान्ति,
किं पुनर्मानवादयः।।
पठनाद्धारणाद्देवि, सृष्टि-
संहारको भवेत्।
अभिचारादिकाः सर्वेया या साध्य-
तमाः क्रियाः।।
स्मरेणन महा-काल्याः, नाशं
जग्मुः सुरेश्वरि,
सिद्धि-विद्या महा काली, परत्रेह च
मोदते।।
सप्त-लक्ष-महा-विद्याः,
गोपिताः परमेश्वरि,
महा-काली महा-देवी, शंकरस्येष्ट-
देवता।।
यस्याः प्रसाद-मात्रेण, पर-ब्रह्म
महेश्वरः।
कृत्रिमादि-विषघ्ना सा, प्रलयाग्नि-
निवर्तिका।।
त्वद्-भक्त-दशंनाद् देवि,
कम्पमानो महेश्वरः।
यस्य निग्रह-मात्रेण, पृथिवी प्रलयं
गता।।
दश-विद्याः सदा ज्ञाता, दश-द्वार-
समाश्रिताः।
प्राची-द्वारे भुवनेशी, दक्षिणे
कालिका तथा।।
नाक्षत्री पश्चिमे द्वारे, उत्तरे
भैरवी तथा।
ऐशान्यां सततं देवि, प्रचण्ड-
चण्डिका तथा।।
आग्नेय्यां बगला-देवी, रक्षः-कोणे
मतंगिनी,
धूमावती च वायव्वे, अध-ऊर्ध्वे च
सुन्दरी।।
सम्मुखे षोडशी देवी, सदा जाग्रत्-
स्वरुपिणी।
वाम-भागे च देवेशि, महा-त्रिपुर-
सुन्दरी।।
अंश-रुपेण देवेशि,
सर्वाः देव्यः प्रतिष्ठिताः।
महा-प्रत्यंगिरा सैव,
विपरीता तथोदिता।।
महा-विष्णुर्यथा ज्ञातो,
भुवनानां महेश्वरि।
कर्ता पाता च संहर्ता, सत्यं सत्यं
वदामि ते।।
भुक्ति-मुक्ति-प्रदा देवी, महा-
काली सुनिश्चिता।
वेद-शास्त्र-प्रगुप्ता सा, न
दृश्या देवतैरपि।।
अनन्त-कोटि-सूर्याभा, सर्व-शत्रु-
भयंकरी।
ध्यान-ज्ञान-विहीना सा, वेदान्तामृत-
वर्षिणी।।
सर्व-मन्त्र-मयी काली, निगमागम-
कारिणी।
निगमागम-कारी सा, महा-प्रलय-
कारिणी।।
यस्या अंग-घर्म-लवा,
सा गंगा परमोदिता।
महा-काली नगेन्द्रस्था,
विपरीता महोदयाः।।
यत्र-यत्र प्रत्यंगिरा, तत्र
काली प्रतिष्ठिता।
सदा स्मरण-मात्रेण,
शत्रूणां निगमागमाः।।
नाशं जग्मुः नाशमायुः सत्यं सत्यं
वदामि ते।
पर-ब्रह्म महा-देवि,
पूजनैरीश्वरो भवेत्।।
शिव-कोटि-समो योगी, विष्णु-कोटि-
समः स्थिरः।
सर्वैराराधिता सा वै, भुक्ति-मुक्ति-
प्रदायिनी।।
गुरु-मन्त्र-शतं जप्त्वा, श्वेत-
सर्षपमानयेत्।
दश-दिशो विकिरेत् तान्, सर्व-शत्रु-
क्षयाप्तये।।
भक्त-रक्षां शत्रु-नाशं, सा करोति च
तत्क्षणात्।
ततस्तु पाठ-मात्रेण, शत्रुणां मारणं
भवेत्।।
गुरु-मन्त्रः- “ॐ हूं स्फारय-स्फारय,
मारय-मारय, शत्रु-वर्गान् नाशय-नाशय
स्वाहा।”
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीमहा-विपरीत-
प्रत्यंगिरा-स्तोत्र-माला-मन्त्रस्य
श्रीमहा-काल-भैरव ऋषिः, त्रिष्टुप्
छन्दः,
श्रीमहा-विपरीत-प्रत्यंगिरा देवता, हूं
बीजं,
ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, मम श्रीमहा-
विपरीत-प्रत्यंगिरा-प्रसादात्
सर्वत्र सर्वदा सर्व-विध-रक्षा-
पूर्वक
सर्व-शत्रूणां नाशार्थे यथोक्त-फल-
प्राप्त्यर्थे वा पाठे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः-
शिरसि श्रीमहा-काल-भैरव ऋषये नमः।
मुखे त्रिष्टुप् छन्दसे नमः।
हृदि श्रीमहा-विपरीत-
प्रत्यंगिरा देवतायै नमः।
गुह्ये हूं बीजाय नमः।
पादयोः ह्रीं शक्तये नमः।
नाभौ क्लीं कीलकाय नमः।
सर्वांगे मम श्रीमहा-विपरीत-
प्रत्यंगिरा-प्रसादात्
सर्वत्र सर्वदा सर्व-विध-रक्षा-
पूर्वक
सर्व-शत्रूणां नाशार्थे यथोक्त-फल-
प्राप्त्यर्थे
वा पाठे विनियोगाय नमः।
कर-न्यासः-
हूं ह्रीं क्लीं ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ तर्जनीभ्यां नमः।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ मध्यमाभ्यां नमः।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ अनामिकाभ्यां नमः।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ कर-तल-द्वयोर्नमः।
हृदयादि-न्यासः
हूं ह्रीं क्लीं ॐ हृदयाय नमः।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ शिरसे स्वाहा।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ शिखायै वषट्।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ कवचाय हुम्।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ नेत्र-त्रयाय वौषट्।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ अस्त्राय फट्।
।।मूल स्तोत्र-पाठ।।
ॐ नमो विपरीत-प्रत्यंगिरायै
सहस्त्रानेक-कार्य-लोचनायै कोटि-
विद्युज्जिह्वायै
महा-व्याव्यापिन्यै संहार-रुपायै
जन्म-शान्ति-कारिण्यै।
मम स-परिवारकस्य भावि-भूत-
भवच्छत्रून्
स-दाराऽपत्यान् संहारय संहारय,
महा-प्रभावं दर्शय दर्शय, हिलि हिलि,
किलि किलि, मिलि मिलि, चिलि चिलि,
भूरि भूरि,
विद्युज्जिह्वे, ज्वल ज्वल, प्रज्वल
प्रज्वल, ध्वंसय ध्वंसय,
प्रध्वंसय प्रध्वंसय, ग्रासय ग्रासय,
पिब पिब,
नाशय नाशय, त्रासय त्रासय,
वित्रासय वित्रासय, मारय मारय,
विमारय विमारय, भ्रामय भ्रामय,
विभ्रामय विभ्रामय, द्रावय द्रावय,
विद्रावय विद्रावय
हूं हूं फट् स्वाहा।।२४
हूं हूं हूं हूं हूं
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं
ॐ ॐ ॐ ॐ
विपरीत-प्रत्यंगिरे, हूं लं ह्रीं लं क्लीं लं
ॐ लं फट् फट् स्वाहा।
हूं लं ह्रीं क्लीं ॐ विपरीत-प्रत्यंगिरे।
मम स-परिवारकस्य यावच्छत्रून्
देवता-पितृ-पिशाच-नाग-गरुड़-किन्नर-
विद्याधर-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-लोक-
पालान्
ग्रह-भूत-नर-लोकान् स-मन्त्रान्
सौषधान् सायुधान् स-सहायान् बाणैः
छिन्दि छिन्दि, भिन्धि भिन्धि,
निकृन्तय निकृन्तय, छेदय छेदय,
उच्चाटय उच्चाटय, मारय मारय,
तेषां साहंकारादि-धर्मान् कीलय कीलय,
घातय घातय, नाशय नाशय, विपरीत-
प्रत्यंगिरे।
स्फ्रें स्फ्रेंत्कारिणि।
ॐ ॐ जं जं जं जं जं, ॐ
ठः ठः ठः ठः ठः
मम स-परिवारकस्य शत्रूणां सर्वाः
विद्याः स्तम्भय स्तम्भय, नाशय
नाशय,
हस्तौ स्तम्भय स्तम्भय, नाशय
नाशय,
मुखं स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय,
नेत्राणि स्तम्भय स्तम्भय, नाशय
नाशय,
दन्तान् स्तम्भय स्तम्भय, नाशय
नाशय,
जिह्वां स्तम्भय स्तम्भय, नाशय
नाशय,
पादौ स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय,
गुह्यं स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय,
स-कुटुम्बानां स्तम्भय स्तम्भय, नाशय
नाशय,
स्थानं स्तम्भय स्तम्भय, नाशय
नाशय,
सम्प्राणान् कीलय कीलय, नाशय
नाशय,
हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं
क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं
ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

फट् फट् स्वाहा।
मम स-परिवारकस्य सर्वतो रक्षां कुरु
कुरु,
फट् फट् स्वाहा ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं।।
२५
ऐं ह्रूं ह्रीं क्लीं हूं सों विपरीत-
प्रत्यंगिरे,
मम स-परिवारकस्य भूत-
भविष्यच्छत्रूणामुच्चाटनं कुरु कुरु,
हूं हूं फट् फट् स्वाहा,
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं वं वं वं वं वं
लं लं लं लं लं लं रं रं रं रं रं यं यं यं यं
यं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
नमो भगवति, विपरीत-प्रत्यंगिरे, दुष्ट-
चाण्डालिनि,
त्रिशूल-वज्रांकुश-शक्ति-शूल-धनुः-शर-
पाश-धारिणि,
शत्रु-रुधिर-चर्म मेदो-मांसास्थि-मज्जा-
शुक्र-मेहन्-वसा-वाक्-प्राण-मस्तक-
हेत्वादि-भक्षिणि,
पर-ब्रह्म-शिवे, ज्वाला-दायिनि,
ज्वाला-मालिनि,
शत्रुच्चाटन-मारण-क्षोभण-स्तम्भन-
मोहन-द्रावण-जृम्भण-भ्रामण-रौद्रण-
सन्तापन-यन्त्र-मन्त्र-तन्त्रान्तर्याग-
पुरश्चरण-भूत-शुद्धि-पूजा-फल-परम-
निर्वाण-हरण-कारिणि,
कपाल-खट्वांग-परशु-धारिणि।
मम स-परिवारकस्य भूत-
भविष्यच्छत्रुन् स-सहायान् स-वाहनान्
हन हन रण रण,
दह दह, दम दम, धम धम, पच पच, मथ
मथ,
लंघय लंघय, खादय खादय, चर्वय
चर्वय, व्यथय व्यथय,
ज्वरय ज्वरय, मूकान् कुरु कुरु, ज्ञानं
हर हर, हूं हूं फट् फट् स्वाहा।।२६
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं हूं हूं
हूं हूं हूं
क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
विपरीत-प्रत्यंगिरे।
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं हूं हूं
हूं हूं हूं
क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् स्वाहा।
मम स-परिवारकस्य कृत मन्त्र-यन्त्र-
तन्त्र-हवन-कृत्यौषध-विष-चूर्ण-
शस्त्राद्यभिचार-सर्वोपद्रवादिकं येन
कृतं,
कारितं, कुरुते, करिष्यति, तान् सर्वान्
हन हन, स्फारय स्फारय,
सर्वतो रक्षां कुरु कुरु, हूं हूं फट् फट्
स्वाहा।
हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं
क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट्
स्वाहा।।२७
ॐ हूं ह्रीं क्लीं ॐ अं विपरीत-
प्रत्यंगिरे,
मम स-परिवारकस्य शत्रवः कुर्वन्ति,
करिष्यन्ति,
शत्रुस्च, कारयामास, कारयिष्यन्ति,
याऽ याऽन्यां कृत्यान् तैः सार्द्ध
तांस्तां विपरीतां कुरु कुरु,
नाशय नाशय, मारय मारय,
श्मशानस्थां कुरु कुरु, कृत्यादिकां
क्रियां भावि-भूत-भवच्छत्रूणां यावत्
कृत्यादिकां
विपरीतां कुरु कुरु, तान् डाकिनी-मुखे
हारय हारय,
भीषय भीषय, त्रासय त्रासय, मारय
मारय,
परम-शमन-रुपेण हन हन,
धर्मावच्छिन्न-निर्वाणं हर हर,
तेषां इष्ट-देवानां शासय शासय,
क्षोभय क्षोभय,
प्राणादि-मनो-बुद्धयहंकार-क्षुत्-
तृष्णाऽऽकर्षण-लयन-आवागमन-
मरणादिकं नाशय नाशय,
हूं हूं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं ॐ फट् फट्
स्वाहा।२८
क्षं ऴं हं सं षं शं। वं लं रं यं।
मं भं बं फं पं। नं धं दं थं तं। णं ढं डं
ठं टं।
ञं झं जं छं चं। ङं घं गं खं कं।
अः अं औं ओं ऐं एं ॡं लृं ॠं ऋं ऊं उं ईं
इं आं अं।
हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं
क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
विपरीत-प्रत्यंगिरे, हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं
क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट्
स्वाहा।
क्षं ऴं हं सं षं शं। वं लं रं यं। मं भं बं
फं पं।
नं धं दं थं तं। णं ढं डं ठं टं। ञं झं जं
छं चं। ङं घं गं खं कं।
अः अं औं ओं ऐं एं ॡं लृं ॠं ऋं ऊं उं ईं
इं आं अं,
हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्ल
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट्
स्वाहा।।२९
अः अं औं ओं ऐं एं ॡं लृं ॠं ऋं ऊं उं ईं
इं आं अं। ङं घं गं खं कं।
ञं झं जं छं चं। णं ढं डं ठं टं। नं धं दं
थं तं। मं भं बं फं पं।
वं लं रं यं। क्षं ऴं हं सं षं शं। ॐ ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ मम स-परिवारकस्य
स्थाने मम शत्रूणां कृत्यान् सर्वान्
विपरीतान् कुरु कुरु,
तेषां मन्त्र-यन्त्र-तन्त्रार्चन-
श्मशानारोहण-भूमि-स्थापन-भस्म-
प्रक्षेपण-पुरश्चरण-होमाभिषेकादिकान्
कृत्यान् दूरी कुरु कुरु, नाशं कुरु कुरु, हूं
विपरीत-प्रत्यंगिरे।
मां स-परिवारकं सर्वतः सर्वेभ्यो रक्ष
रक्ष हूं ह्रीं फट् स्वाहा।।३०
अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं
औं अं अः।
कं खं गं घं ङं। चं छं जं झं ञं। टं ठं डं
ढं णं। तं थं दं धं नं।
पं फं बं भं मं। यं रं लं वं। शं षं सं हं
ळं क्षं।
ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ
क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ
क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ
क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ हूं ह्रीं क्लीं ॐ
विपरीत-प्रत्यंगिरे।
हूं ह्रीं क्लीं ॐ फट् स्वाहा। ॐ
क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ
क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं
ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं, अं आं इं ईं उं ऊं ऋं
ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः।
कं खं गं घं ङं। चं छं जं झं ञं। टं ठं डं
ढं णं। तं थं दं धं नं। पं फं बं भं मं। यं
रं लं वं।
शं षं सं हं ळं क्षं। विपरीत-प्रत्यंगिरे।
मम स-परिवारकस्य
शत्रूणां विपरीतादि-क्रियां नाशय
नाशय, त्रुटिं कुरु कुरु, तेषामिष्ट-
देवतादि-विनाशं कुरु कुरु,
सिद्धिं अपनयापनय, विपरीत-
प्रत्यंगिरे, शत्रु-मर्दिनि।
भयंकरि।
नाना-कृत्यादि-मर्दिनि, ज्वालिनि, महा-
घोर-तरे, त्रिभुवन-भयंकरि शत्रूणां मम
स-परिवारकस्य चक्षुः-श्रोत्रादि-
पादौं सवतः सर्वेभ्यः सर्वदा रक्षां कुरु
कुरु स्वाहा।।३१
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ वसुन्धरे।
मम स-परिवारकस्य स्थानं रक्ष रक्ष
हुं फट् स्वाहा।।३२
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ महा-लक्ष्मि।
मम स-परिवारकस्य पादौ रक्ष रक्ष हुं
फट् स्वाहा।।३३
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ चण्डिके।
मम स-परिवारकस्य जंघे रक्ष रक्ष हुं
फट् स्वाहा।।३४
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ चामुण्डे।
मम स-परिवारकस्य गुह्यं रक्ष रक्ष
हुं फट् स्वाहा।।३५
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ इन्द्राणि।
मम स-परिवारकस्य नाभिं रक्ष रक्ष हुं
फट् स्वाहा।।३६
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ नारसिंहि।
मम स-परिवारकस्य बाहू रक्ष रक्ष हुं
फट् स्वाहा।।३७
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ वाराहि।
मम स-परिवारकस्य हृदयं रक्ष रक्ष
हुं फट् स्वाहा।।३८
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ वैष्णवि।
मम स-परिवारकस्य कण्ठं रक्ष रक्ष
हुं फट् स्वाहा।।३९
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ कौमारि।
मम स-परिवारकस्य वक्त्रं रक्ष रक्ष
हुं फट् स्वाहा।।४०
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ माहेश्वरि।
मम स-परिवारकस्य नेत्रे रक्ष रक्ष हुं
फट् स्वाहा।।४१
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ब्रह्माणि।
मम स-परिवारकस्य शिरो रक्ष रक्ष हुं
फट् स्वाहा।।४२
हूं ह्रीं क्लीं ॐ विपरीत-प्रत्यंगिरे। मम
स-परिवारकस्य छिद्रं सर्व
गात्राणि रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।४३
सन्तापिनी संहारिणी, रौद्री च
भ्रामिणी तथा।
जृम्भिणी द्राविणी चैव,
क्षोभिणि मोहिनी ततः।।
स्तम्भिनी चांडशरुपास्ताः, शत्रु-पक्षे
नियोजिताः।
प्रेरिता साधकेन्द्रेण, दुष्ट-शत्रु-
प्रमर्दिकाः।।
ॐ सन्तापिनि! स्फ्रें स्फ्रें मम स-
परिवारकस्य शत्रुन् सन्तापय सन्तापय
हूं फट् स्वाहा।।४४
ॐ संहारिणि! स्फ्रें स्फ्रें मम स-
परिवारकस्य शत्रुन् संहारय संहारय हूं
फट् स्वाहा।।४५
ॐ रौद्रि! स्फ्रें स्फ्रें मम स-
परिवारकस्य शत्रुन् रौद्रय रौद्रय हूं
फट् स्वाहा।।४६
ॐ भ्रामिणि! स्फ्रें स्फ्रें मम स-
परिवारकस्य शत्रुन् भ्रामय भ्रामय हूं
फट् स्वाहा।।४७
ॐ जृम्भिणि! स्फ्रें स्फ्रें मम स-
परिवारकस्य शत्रुन् जृम्भय जृम्भय हूं
फट् स्वाहा।।४८
ॐ द्राविणि। स्फ्रें स्फ्रें मम स-
परिवारकस्य शत्रुन् द्रावय द्रावय हूं
फट् स्वाहा।।४९
ॐ क्षोभिणि। स्फ्रें स्फ्रें मम स-
परिवारकस्य शत्रुन् क्षोभय क्षोभय हूं
फट् स्वाहा।।५०
ॐ मोहिनि। स्फ्रें स्फ्रें मम स-
परिवारकस्य शत्रुन् मोहय मोहय हूं फट्
स्वाहा।।५१
ॐ स्तम्भिनि। स्फ्रें स्फ्रें मम स-
परिवारकस्य शत्रुन् स्तम्भय स्तम्भय
हूं फट् स्वाहा।।५२
।।फल-श्रुति।।
श्रृणोति य इमां विद्यां, श्रृणोति च
सदाऽपि ताम्।
यावत् कृत्यादि-शत्रूणां, तत्क्षणादेव
नश्यति।।
मारणं शत्रु-वर्गाणां, रक्षणाय चात्म-
परम्।
आयुर्वृद्धिर्यशो-वृद्धिस्तेजो-
वृद्धिस्तथैव च।।
कुबेर इव वित्ताढ्यः, सर्व-
सौख्यमवाप्नुयात्।
वाय्वादीनामुपशमं, विषम-ज्वर-
नाशनम्।।
पर-वित्त-हरा सा वै, पर-प्राण-
हरा तथा।
पर-क्षोभादिक-करा, तथा सम्पत्-
करा शुभा।।
स्मृति-मात्रेण देवेशि। शत्रु-वर्गाः लयं
गताः।
इदं सत्यमिदं सत्यं, दुर्लभा देवतैरपि।।
शठाय पर-शिष्याय, न
प्रकाश्या कदाचन।
पुत्राय भक्ति-युक्ताय, स्व-शिष्याय
तपस्विने।।
प्रदातव्या महा-विद्या, चात्म-वर्ग-
प्रदायतः।
विना ध्यानैर्विना जापैर्वना पूजा-
विधानतः।।
विना षोढा विना ज्ञानैर्मोक्ष-
सिद्धिः प्रजायते।
पर-नारी-हरा विद्या, पर-रुप-हरा तथा।।
वायु-चन्द्र-स्तम्भ-करा, मैथुनानन्द-
संयुता।
त्रि-सन्ध्यमेक-सन्ध्यं वा,
यः पठेद्भक्तितः सदा।।
सत्यं वदामि देवेशि। मम कोटि-
समो भवेत्।
क्रोधाद्देव-गणाः सर्वे, लयं
यास्यन्ति निश्चितम्।।
किं पुनर्मानवा देवि। भूत-
प्रेतादयो मृताः।
विपरीत-समा विद्या, न भूता न
भविष्यति।।
पठनान्ते पर-ब्रह्म-विद्यां स-
भास्करां तथा।
मातृकांपुटितं देवि, दशधा प्रजपेत्
सुधीः।।
वेदादि-पुटिता देवि। मातृकाऽनन्त-
रुपिणी।
तया हि पुटितां विद्यां, प्रजपेत्
साधकोत्तमः।।
मनो जित्वा जपेल्लोकं, भोग रोगं
तथा यजेत्।
दीनतां हीनतां जित्वा, कामिनी निर्वाण-
पद्धतिम्।।
पर-ब्रह्म-विद्या-
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अँ आँ इँ ईँ उँ
ऊँ ऋँ ॠँ लृँ ॡँ एँ ऐँ ओँ औँ अँ अः।
कँ खँ गँ घँ ङँ। चँ छँ जँ झँ ञँ। टँ ठँ डँ
ढँ णँ। तँ थँ दँ धँ नँ। पँ फँ बँ भँ मँ।
यँ रँ लँ वँ। शँ षँ सँ हँ ळँ क्षँ। ॐ ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
विपरीत-पर-ब्रह्म-महा-प्रत्यंगिरे ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ,
अँ आँ इँ ईँ उँ ऊँ ऋँ ॠँ लृँ ॡँ एँ ऐँ ओँ
औँ अँ अः। कँ खँ गँ घँ ङँ।
चँ छँ जँ झँ ञँ। टँ ठँ डँ ढँ णँ। तँ थँ दँ
धँ नँ। पँ फँ बँ भँ मँ। यँ रँ लँ वँ।
शँ षँ सँ हँ ळँ क्षँ। ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
ॐ ॐ। (१० वारं जपेत्)।।६६ से ७५
प्रार्थना-
ॐ विपरीत-पर-ब्रह्म-महा-प्रत्यंगिरे।
स-परिवारकस्य
सर्वेभ्यः सर्वतः सर्वदा रक्षां कुरु
कुरु,
मरण-भयमपनयापनय, त्रि-जगतां बल-
रुप-वित्तायुर्मे स-परिवारकस्य
देहि देहि, दापय दापय, साधकत्वं
प्रभुत्वं च सततं देहि देहि, विश्व-रुपे।
धनं पुत्रान् देहि देहि, मां स-परिवारकं,
मां पश्यन्तु।
देहिनः सर्वे हिंसकाः हि प्रलयं यान्तु,
मम स-परिवारकस्य यावच्छत्रूणां
बल-बुद्धि-हानिं कुरु कुरु, तान् स-
सहायान् सेष्ट-देवान् संहारय संहारय,
तेषां मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र-लोकान्
प्राणान् हर हर, हारय हारय,
स्वाभिचारमपनयापनय,
ब्रह्मास्त्रादीनि नाशय नाशय, हूं हूं
स्फ्रें स्फ्रें ठः ठः ठः फट् फट्
स्वाहा।।
।।इति श्रीमहा-विपरीत-प्रत्यंगिरा-
स्तोत्रम्।।

 

 

 

 

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गरुड़ोपनिषत् ्

गरुडोपनिषत्

विषं ब्रह्मातिरिक्तं स्यादमृतं ब्रह्ममात्रकम् .
ब्रह्मातिरिक्तं विषवद्ब्रह्ममात्रं खगेडहम् ..
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः .. भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ..
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः .. व्यशेम देवहितं यदायुः ..
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः .. स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ..
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः .. स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ..
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः .
.
हरिः ॐ .. गारुडब्रह्मविद्यां प्रवक्ष्यामि यां ब्रह्मा विद्यां
नारदाय प्रोवाच नारदो बृहत्सेनाय बृहत्सेन इन्द्राय इन्द्रो
भरद्वाजाय भरद्वाजो जीवत्कामेभ्यः शिष्येभ्यः प्रायच्छत
्.
अस्याः श्रीमहागरुडब्रह्मविद्याया ब्रह्मा ऋषिः . गायत्री छन्दः .
श्रीभगवान्महागरुडो देवता . श्रीमहागरुडप्रीत्यर्थे मम
सकलविषविनाशनार्थे जपे विनियोगः . ॐ नमो भगवते
अङ्गुष्ठाभ्यां नमः . श्री महागरुडाय तर्जनीभ्यां स्वाहा .
पक्षीन्द्राय मध्यमाभ्यां वषट् . श्रीविष्णुवल्लभाय
अनामिकाभ्यां हुम् . त्रैलोक्य परिपूजिताय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् .
उग्रभयङ्करकालानलरूपाय करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् .
एवं हृदयादिन्यासः . भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्बन्धः
. ध्यानम् .
स्वस्तिको दक्षिणं पादं वामपादं तु कुञ्चितम् .
प्राञ्जलीकृतदोर्युग्मं गरुडं हरिवल्लभम् .. १..
अनन्तो वामकटको यज्ञसूत्रं तु वासुकिः .
तक्षकाः कटिसूत्रं तु हारः कार्कोट उच्यते .. २..
पद्मो दक्षिणकर्णे तु महापद्मस्तु वामके .
शङ्खः शिरःप्रदेशे तु गुलिकस्तु भुजान्तरे .. ३..
पौण्ड्रकालिकनागाभ्यां चामराभ्यां स्वीजितम् .
एलापुत्रकनागाद्यैः सेव्यमानं मुदान्वितम् .. ४..
कपिलाक्षं गरुत्मन्तं सुवर्णसदृशप्रभम् .
दीर्घबाहुं बृहत्स्कन्धं नादाभरणभूषितम् .. ५..
आजानुतः सुवर्णाभमाकट्योस्तुहिनप्रभम् .
कुङ्कुमारुणमाकण्ठं शतचन्द्र निभाननम् .. ६..
नीलाग्रनासिकावक्त्रं सुमहच्चारुकुण्डलम् .
दंष्ट्राकरालवदनं किरीटमुकुटोज्ज्वलम् .. ७..
कुङ्कुमाअरुणसर्वाङ्गं कुन्देन्दुधवलाननम् .
विष्णुवाह नमस्तुभ्यं क्षेमं कुरु सदा मम .. ८..
एवं ध्यायेत्त्रिसन्ध्यासु गरुडं नागभूषणम् .
विषं नाशयते शीघ्रं तूलरशिमिवानलः .. ९..

ओमीमों नमो भगवते श्रीमहागरुडाय पक्षीन्द्राय
विष्णुवल्लभाय त्रैलोक्यपरिपूजिताय उग्रभयंकरकालानलरूपाय
वज्रनखाय वज्रतुण्डाय वज्रदन्ताय वज्रदंष्ट्राय
वज्रपुच्छाय वज्रपक्षालक्षितशरीराय ओमीकेह्येहि
श्रीमहागरुडाप्रतिशासनास्मिन्नाविशाविश दुष्टानां
विषं दूषयदूषय स्पृष्टानां नाशयनाशय
दन्दशूकानां विषं दारयदारय प्रलीनं विषं
प्रणाशयप्रणाशय सर्वविषं नाशयनाशय हनहन
दहदह पचपच भस्मीकुरुभस्मीकुरु हुं फट् स्वाहा ..
चन्द्रमण्डलसंकाश सूर्यमण्डलमुष्टिक .
पृथ्वीमण्डलमुद्राङ्ग श्रीमहागरुडाय विषं
हरहर हुं फट् स्वाहा .. ॐ क्षिप स्वाहा .. ओमीं
सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषाणां च विषरूपिणी
विषदूषिणी विषशोषणी विषनाशिनी विषहारिणी
हतं विषं नष्टं विषमन्तःप्रलीनं विषं प्रनष्टं
विषं हतं ते ब्रह्मणा विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
ॐ नमो भगवते महागरुडाय विष्णुवाहनाय
त्रैलोक्यपरिपूजिताय वज्रनखवज्रतुण्डाय वज्रपक्षालंकृत-
शरीराय एह्येहि महागरुड विषं छिन्धिच्छिन्धि
आवेशयावेशय हुं फट् स्वाहा ..
सुपर्णोऽसि गरुत्मात्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रं चक्षुः स्तोम आत्मा
साम ते तनूर्वमदेव्यं बृहद्रथन्तरे पक्षौ यज्ञायज्ञियं
पुच्छं छन्दांस्यङ्गानि धिष्णिया शफा यजूंशि नाम ..
सुपर्णोऽसि गरुत्मान्दिवं गच्छ सुवः पत ओमीं ब्रह्मविद्या-
ममावास्यायां पौर्णमास्यां पुरोवाच सचरति सचरति
तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं
विषं नष्टं विषं प्रनष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
तस्र्यम् . यद्यनन्तकदूतोऽसि यदि वानन्तकः स्वयं सचरति सचरति
तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं
विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य
वज्रेण स्वाहा .
यदि वाअसुकिदूतोऽसि यदि वा वासुकिः स्वयं सचरति सचरति
तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं
नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा
विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा यदि वा तक्षकः स्वयं सचरति
सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं
नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ब्रह्मणा
विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
यदि कर्कोटकदूतोऽसि यदि वा कर्कोटकः स्वयं सचरति सचरति
तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं
हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
यदि पद्मकदूतोऽसि यदि वा पद्मकः स्वयं सचरति सचरति
तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं
नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा
विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
यदि महापद्मकदूतोऽसि यदि वा महापद्मकः स्वयं
सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं
विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा
विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
यदि शङ्खकदूतोऽसि यदि वा शङ्खकः स्वयं
सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी
हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं
हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
यदि गुलिकदूतोऽसि यदि वा गुलिकः स्वयं सचरति सचरति
तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी
हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं
हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
यदि पौण्ड्रकालिकदूतोऽसि यदि वा पौण्ड्रकालिकः स्वयं
सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी
विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण
विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
यदि नागकदूतोऽसि यदि वा नागकः स्वयं सचरति सचरति
तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं
विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते
ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ..
यदि लूतानां प्रलूतानां यदि वृश्चिकानां यदि घोटकानां
यदि स्थावरजङ्गमानां सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी
विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं
विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य
वज्रेण स्वाहा . अनन्तवासुकितक्षककर्कोटकपद्मकमहापद्मक-
शङ्खकगुलिकपौण्ड्रकालिकनागक इत्येषां दिव्यानां
महानागानां महानागादिरूपाणां विषतुण्डानां विषदन्तानां
विषदंष्ट्राणां विषाङ्गानां विषपुच्छानां विश्वचाराणां
वृश्चिकानां लूतानां प्रलूतानां मूषिकाणां गृहगौलिकानां
गृहगोधिकानां घ्रणासानां गृहगिरिगह्वरकालानलवल्मीकोद्भूतानां
तार्णानां पार्णानां काष्ठदारुवृक्षकोटरस्थानां
मूलत्वग्दारुनिर्यासपत्रपुष्पफलोद्भूतानां दुष्टकीटकपिश्वान-
मार्जारजंबुकव्याघ्रवराहाणां जरायुजाण्डजोद्भिज्जस्वेदजानां
शस्त्रबाणक्षतस्फोटव्रणमहाव्रणकृतानां कृत्रिमाणामन्येषां
भूतवेतालकूष्माण्डपिशाचप्रेतराक्षसयक्षभयप्रदानां
विषतुण्डदंष्ट्रानां विषाङ्गानां विषपुच्छानां विषाणां
विषरूपिणी विषदूषिणी विषशोषिणी विषनाशिनी विषहारिणी
हतं विषं नष्टं विषमन्तःप्रलीनं विषं प्रनष्टं विषं हतं ते
ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा . य इमां ब्रह्मविद्याममावास्यायां
पठेच्छृणुयाद्वा यावज्जीवं न हिंसन्ति सर्पाः . अष्टौ ब्राह्मणान्ग्राहयित्वा
तृणेन मोचयेत् . शतं ब्राह्मणान्ग्राहयित्वा चक्षुषा मोचयेत् .
सहस्रं ब्राह्मणान्ग्राहयित्वा मनसा मोचयेत् . सर्पाञ्जले न मुञ्चन्ति .
तृणे न मुञ्चन्ति . काष्ठे न मुञ्चन्तीत्याह भगवान्ब्रह्मेत्युपनिषत्

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः .. भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ..
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः .. व्यशेम देवहितं यदायुः ..
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः .. स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ..
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः .. स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ..
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः .. हरिः ॐ तत्सत् ..
इति श्रीगारुडोपनिषत्समाप्तः

 

 

 

 

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तत्व ज्ञान

तत्व ज्ञान
तत्व ज्ञान
तत्व ज्ञान का अर्थ है- आत्म ज्ञान- त
अर्थात परमात्मा , त्व अर्थात
जीवात्मा ! जीवात्मा और परमात्मा के
एक होने पर ही तत्व ज्ञान होता है!
तत्व ज्ञान बोध कराता है कि सृष्टि
का सार तत्व क्या है, निर्माण का
रहस्य क्या है और हमारे अस्तित्व के
उद्देश्य अर्थात आत्मा के सत्य से
हमें परिचित कराता है . तत्व ज्ञान
को सहज करने के लिए पांच भागो में
सत्य को विभक्त किया गया है – प्रथम -
परमात्मा , द्वितीय – प्रकृति, तृतीय
- जीव , चतुर्थ – समय और पंचम – कर्म
ईश्वर
ईश्वर स्वतंत्र है , परम शुद्ध और
समस्त गुणों से परे है . वह सृष्टि के
रचियता , संरक्षक और विनाशक है ।
ईश्वर पर समय और स्थान का बंधन नहीं
होता है । इश्वर सर्वव्यापी और
अविनाशी है।
प्रकृति
ईश्वर से ही जीव और प्रकृति की
उत्पत्ति हुई है । प्रकृति को शक्ति
भी कहते है। इस प्रकृति अर्थात
शक्ति के दो रूप है – अविद्या और
विद्या . अविद्या प्रकृति का निम्न
स्वरुप है और विद्या प्रकृति का
उच्चतम स्वरुप है। अविद्या को अपरा
विद्या और विद्या को परा विद्या के
नाम से भी जाना जाता है।
प्रकृति के अविद्या स्वरुप को ही
माया कहते है . माया का अर्थ है-
या माँ सा- माया अर्थात जो सत्य नही
किन्तु सत्य प्रतीत होता है वही
माया है ! ईश्वर को सृष्टि की रचना
के लिए अपनी माया रुपी शक्ति का ही
आश्रय लेना पड़ता है। प्रकृति का
स्वभाव जड़ है अर्थात प्रकृति
स्वयं से कुछ निर्माण नहीं करती है
। प्रकृति को गति, चेतना से अर्थात
परमात्मा के संकल्प से प्राप्त
होती है । जब सृष्टि की उत्पत्ति
नहीं हुई होती है तो ईश्वर की यह
दिव्य शक्ति साम्यावस्था में रहती
है अर्थात इसके तत्व सत्व रज और तम
समान मात्रा में उपस्थित रहते है .
इश्वर जब सृष्टि की रचना का संकल्प
लेते है तब इन तत्वों में विषमता
उत्पन्न होती है .सत्व रज और तम के
विभिन्न आनुपातिक संयोग सृष्टि को
विभिन्नता प्रदान करते है। सृष्टि
के आदिकाल का प्रथम तत्व तमस है. तम
से ही क्रमिक रूप से आकाश तत्व, आकाश
से वायु, वायु से अग्नि , अग्नि से जल
और जल से पृथ्वी तत्वों की उत्पत्ति
होती है जिससे समस्त सृष्टि का
प्रादुर्भाव होता है। पञ्च भूत तथा
इन्द्रियों के भोग के विषय अर्थात
रूप रस गंध, स्पर्श शब्द यह सब
अविद्या माया के स्वरुप है ! इस
संसार में जो भी इन्द्रियों द्वारा
अनुभूत किया जा सकता है सब माया के
अंतर्गत आता है। माया इश्वर की
अद्वितीय शक्ति है और यह संसार में
ऐसे समाई हुयीं है जैसे गर्मी/उर्जा
के साथ अग्नि ! अगर अग्नि में से
समस्त ऊष्मा को निकाल लिया जाये तो
उसका कोई अस्तित्व नहीं रहता है !
जिस तरह ताप के बिना अग्नि की
कल्पना नहीं कर सकते उसी प्रकार
इश्वर की माया भी ऐसी ही शक्ति है
जिसके बिना संसार की कल्पना करना भी
असंभव है ! अविद्या माया के कारण
मनुष्य के अहंकार की पुष्टि होती है
और अहम् के साथ इर्ष्या, लोभ , क्रोध
इत्यादि का भी जीवन में प्रवेश हो
जाता है । माया के कारण ही मनुष्य
नाशवान संसार को सत्य मानकर
भौतिकता में उलझा रहता है। अविद्या
अज्ञान पैदा करती है जो इश्वर को
भुला देती है ! जीव आत्मा ईश्वर का
ही अंश है किन्तु माया का प्रभाव
दिव्य गुणों को आच्छादित कर अज्ञान
को पैदा करती है जो जीव को संसार की
ओर उन्मुख कर ईश्वर से दूर कर देता
है।
परा विद्या को ब्रह्म विद्या भी
कहते है क्योकि विद्या रूप में
शक्ति जीव के अन्दर सद्गुणों को
विकसित करती है और सत्संग की इच्छा
ज्ञान भक्ति प्रेम वैराग्य जैसे
गुण प्रदान कर इश्वर को प्राप्त
करने का मार्ग दिखाती है। इन गुणों
का विकास होने पर जीव ईश्वर दर्शन
का अधिकारी होता है ! विद्या रुपी
शक्ति जीव में इश्वरत्व की अनुभूति
करा कर उसको स्वतंत्र और
सामर्थ्यवान बनाती है .
आदि शक्ति का अविद्या रूप भी
आवश्यक है। जिस तरह किसी भी फल का
छिलका रहने पर फल बढता है और फल जब
तैयार हो जाता है तो छिलका फेंक
देना पड़ता है ! इसी तरह माया रूपी
छिलका रहने पर धीरे- धीरे मर्म
ज्ञान होता है ! जब ज्ञान रुपी फल
परिपक्व हो जाता है तब अविद्या रूपी
छिलके का त्याग कर देना चाहिए।
प्रकृति की कोई भी बाधा वास्तव में
बाधा नहीं होती जो भी बाधा दिखाई
पड़ती है वह शक्ति को जगाने की
चुनौती होती है ! उदाहरण के लिए बीज
को जमीन में दबाने पर मिटटी की परत,
जो बीज के ऊपर दिखती है, बाधा की तरह
दिखाई देती है किन्तु सत्य तो यह
होता है की जमीन बीज को दबा कर उसे
अंकुरित होने में सहायता करती है !
इसलिए शक्ति के दोनों रूप आवशयक है.
बंधन और मुक्ति दोनों ही करने वाली
ही आदि शक्ति है उनकी माया से
संसारी जीव माया में बंधा होता है,
पर उनकी दया हो जाये तो वह बंधन से
छूटने में सहायता भी करती है । यही
कारण है कि माया के प्रभाव से मुक्त
होने के लिए देवी की आराधना की जाती
है
जीवात्मा
आत्मा के दो रूप होते है – एक तो
सार्वभौम सर्वोच्च आत्मा और दूसरी
विशेष व्यक्तिगत आत्मा अर्थात जीव
आत्मा. आत्मा अपने सर्वोच्च रूप में
अकर्ता, अभोक्ता ,
अपरिवर्तनशील,शाश्वत , अजन्मा,
अविनाशी, और समस्त विश्वो का सार है.
जीवरूप में आत्मा को परिवर्तनशील,
अनित्य,कर्मो का सम्पादन करने वाला
और उनके फलो का भोग करने वाला,
पुनर्जनम लेने वाला, और शरीर में
सीमित माने गया है. वस्तुत जब
अविद्या के कारण आत्मा शरीर से
सम्बंधित हो जाता है तो वह जीव
आत्मा कहलाता है.
समय-
समय निर्बाधगति से निरंतर चलता
रहता है। वर्तमान में प्रयुक्त हो
रहे समय के मानक मनुष्य ने अपनी
सुविधा के अनुसार बनाये है किन्तु
इन मानको का आधार सूर्य आदि ग्रह ही
है। हर गृह की गति भिन्न होती है और
यही विभिन्न गतियाँ समय में
भिन्नता प्रतीत कराती है। उदाहरण
के लिए एक दिन और रात्रि का
निर्धारण सूर्य और पृथ्वी की
घूर्णन गति और उनकी सापेक्ष स्थिति
पर निर्भर है। इसी तरह चंद्रमा की
स्थिति के आधार पर शुक्ल पक्ष और
कृष्ण पक्ष का निर्धारण किया जाता
है। मौसम का परिवर्तन और धरती पर
होने वाली अन्य घटनाये ग्रहों के
कारण ही घटित होती है। ज्योतिष
विज्ञान में विभिन्न घटनाओ का समय
निर्धारण का आधार भी गृह नक्षत्र और
उनकी विभिन्न गतियाँ है।
समय दो रूपों में अभिव्यक्त होता है
- पदार्थ परक और व्यक्तिपरक। पदार्थ
परक समय वह समय है जो सबके द्वारा
मानी है जैसे घड़ी में सेकंड मिनट और
घंटे का समय। व्यक्ति परक समय वह
समय होता है जो मन को महसूस होता है।
उदाहरण के लिए दुःख का समय मन को
अधिक लम्बा प्रतीत होता है।
समय के और सुविधाजनक प्रयोग के लिए
उसे तीन भागों में विभक्त करते है -
वर्तमान, भूत और भविष्य . समय का वह
भाग जो हम उसी क्षण अनुभव करते है
वर्तमान कहलाता है . यह समय अत्यंत
अल्प होता है। उदाहरण के लिए जो
विचार अथवा कर्म जिस पल आता है
वर्तमान होता है . उस पल के ख़त्म होते
ही वह जो समाप्त हो गया भूतकाल
कहलाता है। काल का वह भाग जो अनुभव
में अभी नहीं आया है भविष्य कहलाता
है .
इस सृष्टि के अन्दर की समस्त वस्तुए
चाहे वह जड़ हो अथवा चेतन समय के
द्वारा प्रभावित होती है। उदाहरण
के लिए मनुष्य , जंतु वृक्ष इत्यादि
सब जन्म लेने के उपरांत विभिन्न
स्थितियों को प्राप्त करते है जैसे
बचपन, यौवन अवस्था और वृद्ध अवस्था
। इसी प्रकार घर जो की निर्जीव
वस्तुओ के प्रयोग से बना होता है
किन्तु वह भी समय व्यतीत होने पर
क्षीणता को प्राप्त होता है। हर
वस्तु अथवा व्यक्ति अपने गुण और
धर्म के अनुसार समय से प्रभावित
होता है। जैसे पत्थर में परिवर्तन
के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती
है किन्तु पुष्प कम समय में
प्रभावित हो जाते है।
कर्म-
यह सम्पूर्ण प्रकृति कर्म नियम
द्वारा ही संचालित है . व्यक्ति को
अपने किये गए कर्म का फल अवश्य
मिलता है क्योंकि बिना भोगे कर्म
के फल का नाश नही होता . कर्म का फल
यदि किसी कारण से इस जनम में नही भोग
पाये तो वह अगले जनम में भोगना
पड़ता है.
कर्म गुणवत्ता के आधार पर मुख्यतः
दो प्रकार के होते है. वह कर्म जो की
फल की प्राप्त करने की आशा में किये
जाते है सकाम कर्म कहलाते है। इस
प्रकार के करम ही व्यक्ति को सुख और
दुःख देते है . किसी भी करम करने के
पीछे व्यक्ति का स्वार्थ छिपा होता
है तो वह सकाम कर्म कहलाता है . सकाम
कर्मो के दो भेद होते है सत्कर्म और
दुष्कर्म .
मनुष्य दिव्य प्राणी तो है परन्तु
उसमे असत का भी तत्व है जो उसे बुराई
का शिकार होने देता है .अपनी
स्वार्थ पूर्ति के लिए जब अशुभकर्म
किया जाता है उदहारण के लिए धन
प्राप्ति के लिए झूठ बोलना , वह
दुष्करम कहलाता है . अपने सुख के लिए
जब दान पुण्य इत्यादि किये जाते है
तो वह सत्कर्म किये जाते है.
यह सत्य है कि सत्कर्म शुभ होते है
लेकिन वह मोक्ष दायक नहीं होते है.
क्यूंकि फल प्राप्ति की इच्छा से जो
भी क्ररम किये जाते है वह सदैव
बंधनकारी होते है वह कर्म जिन्हें
व्यक्ति अपना कर्त्तव्य समझ कर
बिना फल प्राप्ति की इच्छा से करता
है वह निष्काम कर्म कहे जाते है ऐसे
करम व्यक्ति को बंधन में नहीं
बांधते है एवं मोक्ष दायक होते है .
कुछ लोग तटस्थ कर्म का भी इसमें
समावेश करते है। तटस्थ कर्म वह होते
है जिनका कोई विशेष लाभ अथवा हानी
नहीं होता है। इसी प्रकार कुछ
शारीरिक कर्म अभ्यासवश कर लिए जाते
है जैसे भोजन ग्रहण करना , किसी
स्थान पर जाने के लिए चलना .
कर्म उसके फल के दृष्टिकोण से तीन
प्रकार के होते है . संचित कर्म,
प्रारब्ध कर्म, क्रियमाण कर्म .
संचित कर्म – किसी मनुष्य के द्वारा
वर्तमान समय में किया गया जो कर्म
है चाहे वह इस जनम में किया गया हो
अथवा पूर्व जनम में, वह उसका संचित
कर्म कहलाता है. व्यक्ति द्वारा
किये गए समस्त कर्मो का संग्रह
संचित कर्म होते है.
प्रारब्ध कर्म – संचित कर्मो का फल
भोगना प्रारंभ हो जाता है तो उन्हें
प्रारब्ध कर्म कहते है.
क्रियमाण कर्म – जो कर्म वर्तमान
काल में हो रहा है या किया जा रहा है
उसे क्रियमान कर्म कहते है . ये
क्रियमाण कर्म ही भविष्य में
संग्रहित हो कर संचित कर्म बनते है.
और संचित कर्म ही फिर भविष्य में
प्रारब्ध कर्म बनते है.
कर्म क्रियान्वय की दृष्टि में तीन
प्रकार से निष्पादित होते है -
शारीरिक , मानसिक और वाचिक शारीरिक
कर्म ज्ञानेन्द्रियो द्वारा देखे
जा सकते है जैसे भवन का निर्माण
इत्यादि कार्य . मानसिक कर्म में
विभिन्न विचारो का चिंतन,
कल्पनाशीलता और इच्छाओ आदि का
समावेश होता है । वाचिक कर्म वह
होते है जो वाणी द्वारा संपादित
किये जाते है। जैसे भवन निर्माण में
मुख्य शिल्पिकार वाणी का प्रयोग कर
दिशा निर्देश करता है शारीरिक
कर्म किसी न किसी रूप में चिन्हित
किये जा सकते है . यदि कोई व्यक्ति
ह्रदय रोग से पीड़ित होता है तो यह
अनुमान स्वभावतः आता है कि आहार और
विहार का ध्यान नहीं रखा गया है।
वाणी द्वारा किये गए कर्म भी कुछ
समय तक अनुभव किये जा सकते है जैसे
किसी पर यदि कटु शब्दों का प्रयोग
किया जाये तो कहने वाले और सुनने
वाले दोनों पर इसका प्रभाव स्पष्ट
रहता है इन दोनों के विपरीत मानसिक
कर्मों के उद्गम को चिन्हित करना
अत्यंत कठिन होता है क्योकि मन का
क्षेत्र अत्यंत विशाल होता है।
कर्म के समस्त रूप कम या अधिक
मात्रा में एक दुसरे में निहित होते
है। .उदाहरण के लिए विद्याध्यन
मुख्यतः मानसिक कर्म है . यद्यपि
बैठना भी एक प्रकार का शारीरिक कर्म
है किन्तु इसमें शारीरिक श्रम कम
मात्रा में होता है। अध्ययन यदि
अच्छी पुस्तको का किया जाये तो
सत्कर्म हो जाता है किन्तु यदि
विषय आत्मा की उन्नति के अनुकूल
नहीं हो तो यही कर्म दुष्कर्म बन
जाता है। बचपन में किया हुआ अध्ययन
संचित कर्म के रूप में एकत्र होता
है और युवावस्था में व्यवसाय में
सहयोग कर उसका फल प्रदान करता है।
कर्म को सक्रिय रूप अदृश्य मानसिक
इच्छाए देती है. अतः कर्म की
गुणवत्ता सत्व , रज और तम प्रवृत्ति
अर्थात इच्छा के अनुसार होती है.
मनुष्य की वर्तमान प्रकृति अर्थात
स्वाभाव का आधार पूर्व जन्म के कर्म
होते है। कुछ कर्म जिनका फल किसी
कारणवश वर्तमान में नहीं मिल पाता
है वह मनुष्य के कार्मिक खाते में
बीज रूप में जमा हो जाते है और समय
आने पर प्रवृत्ति और परिस्थितियों
के रूप में फल देते है. जब तक सभी
कर्मो का फल प्राप्त नहीं कर लिया
जाता कर्म और फल को संतुलित नहीं कर
लिया जाता , जन्म और मरण की
प्रक्रिया चलती रहती है.
ईश्वर , समय , जीव , कर्म और प्रकृति
में समन्वय -
जैसे जल बिना किसी प्रयोजन के नीचे
की और ही बहता है क्यूंकि नीचे की और
बहना पानी की प्रकृति है. वैसे ही
सृष्टि रचना करना ब्रह्म की
प्रकृति है. जीवात्मा का वास्तविक
स्वरुप ब्रह्म है . ब्रह्म ही
सर्वोच्च आत्मा है. लेकिन अज्ञानवश
जीवात्मा को यह अहम् होता है की वह
ब्रम्ह से पृथक अपना अलग अस्तित्व
रखता है. इसी अज्ञान के कारण वह
संसार के बंधन में बंधता है. आत्मा
का यह कर्तत्व और भोगत्व प्रकृति के
गुणों के साथ उसके संयोगके कारण
उत्पन होता है. आत्मा अकर्ता होते
हुए भी माया के ही कारण अहम् भाव से
प्रकृति की क्रियाओं में स्वयं को
कर्ता मान लेता है. और विभिन प्रकार
के कर्म करने में व्यस्त हो जाता है.
यद्यपि वह अपने यथार्थ स्वरुप में न
वह करता है न भोगता केवल दृष्टा है.
किन्तु अहंकार के कारण कर्म पर भाव
आरोपित करने के कारण वह उन कर्मो का
भोक्ता बन जाता है। यह कर्म का नियम
है की जो करता है वह ही फलो को भोगता
भी है.
जिस प्रकार किसी व्यक्ति के बाहरी
कार्य शरीर के द्वारा किये जाते है
किन्तु उन कार्यो पर नियन्त्रण
बुद्दि करती है उसी तरह जीव के
द्वारा किये हुए कार्यो का नियमन
परमात्मा करता है ! यद्यपि ईश्वर का
यह अनुमोदन जीव की इच्छा के अनुसार
ही होता है ! कोई जीव यदि बुरा कर्म
करना चाहता है तो भी ईश्वर उसको उसी
दिशा में अनुमति प्रदान कर देता है !
ईश्वर का यह नियमन जीव के द्वारा
भूतकाल के में किये गये कर्मो के
आधार पर होता है ! यद्यपि कर्मो का
जीव स्वामी है किन्तु कर्मो के फल
का अधिकार इश्वर को है। जीव स्वयं
अपने कर्म के फल को निर्धारित नही
कर सकते ! क्योकि यदि जीव को यह
स्वतंत्रता मिल जाये तो वह केवल
अच्छे फलो का ही भोग लेंगे और बुरे
कर्म दूसरो पर आरोपित कर देंगे !
इसके कारण सम्पूर्ण सृष्टि के
असंतुलित हो जाएगी । प्रकृति भी
स्वभावतः जड़ होने के कारण कर्म
फलो की व्यवस्था नही कर सकती ! कर्म
स्वयम में जड़ है. अतः यह भी अपने आप
संचालित नहीं होते . केवल परमात्मा
ही जीवो के कर्मफल के भोग की
व्यवस्था करता है ! इन कर्मो का
प्रथम गतिदाता स्वयं ब्रम्ह है. वह
एक बार कर्मो का संचालन करके फिर
स्वयम उससे निवृत्त हो जाते है.
सृष्टि संचालन के लिए ब्रह्म एक
तत्व का दूसरे तत्व से संयोग करवा
देते है. अतः कर्मो में प्रथम गति
सृष्टि के प्रारंभ करने के बाद वह
जीवात्मा पर छोड़ देता है कि अब उसे
कौन से कर्म करने है . मनुष्य की
स्वतंत्रता केवल कर्म का चुनाव
करने में स्वीकार की गयी है.
जीवात्मा को अपने निर्णयों से कर्म
का चुनाव कर्म स्वातंत्र कहलाता
है. किन्तु कर्म के फलो का अधिकार
सिर्फ इश्वर के पास ही है। ऐसा नहीं
हो सकता की जीव कर्म कुछ और करे और फल
उसे कुछ और मिले. जिस प्रकार आम पाक
कर अपने स्वभाव से आम ही बनता है
अनार नहीं उसी प्रकार जीव को वही फल
मिलता है जो उसने किया और इश्वर उसे
उसका फल प्रदान करते है. कर्म के
सहारे ही जीव इस संसार व् संसारिकता
से सम्बंधित होता है. मृत्यूपरांत
शरीर के समस्त तत्व सृष्टि के उन
तत्वों में विलीन हो जाते है जिनसे
वह बने होते है किन्तु कर्म ही ऐसे
होते है जिनका नाश नहीं होता. और यही
पुनर्जनम का आधार बनते है.
कर्मों का फल ईश्वर समयानुसार दो
गुणों के आधार पर देते है – प्रथम
कर्म की तीव्रता एवं गुणवत्ता,
द्वितीय जीव की पात्रता और सहन करने
की क्षमता । यही कारण है कि समस्त
कर्मो का फल तत्काल नहीं मिलता है ।
कुछ कर्म जो बलवान नहीं होते है,
तुरंत फलदायी होते है। कुछ कर्म जो
बलवान तो होते है किन्तु उनके
फलीभूत होने के लिए परिस्थितिया
नहीं होती है वह फल देने में समय
लेते है . कुछ कर्मो का फल क्षणिक
होता है और कुछ फल दीर्घकाल तक
भोगने पड़ते है. यह समय कर्म और
मनुष्य संकल्प् अर्थात इच्छा
शक्ति के आधार पर निर्धारित होता
है. जैसे क्षुधा शांत करने के लिए
भोजन से कुछ समय की शांति होती है और
उसके लिए पुनः कर्म करना पड़ता है,
किन्तु नौकरी प्राप्त करने हेतु
लम्बे समय तक अध्ययन करना पड़ता है
और उसके परिणाम भी दीर्घकालिक होते
है. जब कर्म के शारीरिक , मानसिक और
वाचिक तीनो रूपों की उर्जा को
संकल्पशक्ति की सहायता से एक
लक्ष्य की प्राप्ति में संचालित की
जाती है तो फल अधिक शुभ और स्थायी
परिणाम देने वाले होते है.
तत्व ज्ञान की प्राप्ति में
ज्योतिष विज्ञान और तंत्र की
भूमिका -
सृष्टि में अगर कोई नियम नहीं हो तो
अनुशासन रहित संसार अस्त व्यस्त हो
जायेगा क्योकि इस बात का विवेक ही
नही रहेगा की कौन सा कर्म क्या फल
लायेगा. इसलिए सम्पूर्ण सृष्टि को
जो कर्म चलायमान करता है उसके अपने
नियत सिद्धांत है. उन सिद्धांतो और
कारक तत्वों को समझकर यदि कर्म किया
जाये तो फल प्राप्ति की दिशा भी
निर्धारित की जा सकती है. किसी भी
कर्म का परिणाम उसमे निहित कारको की
तीव्रता पर निर्भर करता है. ज्योतिष
विज्ञान उन्ही निहित कारको का
निर्धारण करता है. उन कारक तत्वों
में परिवर्तन कर परिणाम को
परिवर्तित किया जाता है।
. यदि व्यक्ति इश्वर के नियमो को
समझकर उसके अनुरूप चले तो जीवन में
आनंद की प्राप्ति होती है. किन्तु
मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही होती
है की वह अपनी सांसारिक इच्छाओ को
पूर्ण करने में ही आनंद समझता है और
समय के महत्त्व को अस्वीकार करने की
भूल कर देता है परिणामतः दुःख पाता
है. उदहारण के लिए धोखा देकर शीघ्र
धन प्राप्त किया जा सकता है किन्तु
भेद खुल जाने पर पुनः लोगो के मन में
अपने प्रति विश्वास को पैदा कर पाना
अत्यंत कठिन होता है. यदि प्रकृति
के नियम के अनुरूप धैर्य रखकर शुभ
कार्य करते रहे और फल के लिए समय की
प्रतीक्षा करे तो दूरगामी परिणाम
शुभ होते है. किन्तु इच्छाओं के
अधीन होकर , ईश्वरीय नियमों के
विरुद्ध जाकर समय से पहले शीघ्र
परिणाम प्राप्त करने की इच्छा के
कारण जो दुःख प्राप्त होता है वह
आसानी से परिवर्तित नहीं किया जा
सकता.
जीव की स्वतंत्रता उसी सीमा तक बदती
है जिस सीमा तक वह स्वयं को
परमात्मा के साथ एकाकार कर देता है..
इसके लिए आवश्यक तथ्य यह है कि
स्वयं को स्वार्थपूर्ण रुचियों और
अरुचियों से मुक्त कर लेना चाहिए.
ज्योतिष विज्ञान मनुष्य की
शारीरिक मानसिक और आत्मिक अवस्था
को निरुपित करता है। ज्योतिष
विज्ञान ग्रहों के माध्यम से कर्म
के हर रूप को इंगित कर प्रगति और
सुधार के लिए आधार बिंदु देता है .
पूर्व कर्म रुपी उर्जा शरीर, मन और
आत्मा पर बंधन का निर्माण करते है
और दिव्य चेतना के प्रवाह को
अवरुद्ध करते है. माया कर्मों के
अनुसार ही मनुष्य को प्रभावित करती
है. इसी कारण हर व्यक्ति का विवेक ,
स्वभाव और और ज्ञान भिन्न भिन्न
होता है. ज्योतिष विज्ञान उन
अवरोधों को पहचान कर नकारात्मक
कर्मों को शुद्ध और सकारात्मक
कर्मों द्वारा उन्हें निष्प्रभावी
करने का मार्ग बताते है. इससे दिव्य
चेतना की ऊर्जा का प्रवाह सहज और
संतुलित हो जाता है. इस प्रकार
ज्योतिष आत्मा और परमात्मा के बीच
के मध्य संतुलन बनाने का एक
महत्वपूर्ण माध्यम है. तंत्र भी
मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियों
को रूपांतरित कर उनको दिव्यता
प्रदान करने में महत्वपूर्ण
भूमिका निभाता है.
मनुष्य का चरम लक्ष्य मोक्ष
प्राप्त करना होता है. जिसके लिए यह
आवश्यक है की मनुष्य के सकाम भाव से
किये गए समस्त कर्मो का नाश हो
जाए.जब साधना के द्वारा व्यक्ति की
प्रवृत्ति शुद्ध हो जाती है तब मन
की चंचलता समाप्त हो जाती है. जब
व्यक्ति इन्द्रियों के विषयों के
साथ आसक्ति से मुक्त हो जाता है.
व्यक्ति के स्वभाव में सकाम की जगह
निष्काम कर्म भावना का उदय हो जाता
है. निष्काम भावना के उदय हो जाने पर
व्यक्ति का अहंकार समाप्त हो जाता
है. फिर उसे लाभ हानि , शुभ अशुभ की
चिंता परेशान नहीं करती. क्यूंकि
विषयों में उसकी आसक्ति समाप्त हो
जाती है. ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति
का सर्वोतम मार्ग है लेकिन इस ज्ञान
मार्ग पर वही चल सकता है जिसने
इन्द्रियों को साध लिया हो.
इन्द्रियों के साधन के लिए
जिज्ञासु को ऐसे गुरु के चरणों में
जाना चाहिए जिसे ब्रह्मज्ञान की
प्राप्ति हो चुकी हो तभी उचित
मार्गदर्शन में मनुष्य अपनी
अशुद्धियों को दूर कर तत्व ज्ञान
अर्थात अपने सत्य स्वरुप से
साक्षात्कार कर पाने में समर्थ हो
पाता है. ।

|| सुदर्शन कवच ||

श्री सुदर्शन कवच द्वारा जीवन
शत्रु रहित करें..
‘श्रीसुदर्शन – चक्र ’ भगवान्
विष्णु का प्रमुख आयुध है,
जिसके माहात्म्य की कथाएँ
पुराणों में स्थान – स्थान पर
दिखाई देती है।
‘मत्स्य -पुराण ’ के अनुसार
एक दिन दिवाकर भगवान् ने
विश्वकर्मा जी से निवेदन
किया कि ‘कृपया मेरे प्रखर
तेज को कुछ कम कर दें ,
क्योंकि अत्यधिक उग्र तेज
के कारण
प्रायः सभी प्राणी सन्तप्त
हो जाते हैं।’
विश्वकर्मा जी ने सूर्य को
‘चक्र – भूमि ’ पर चढ़ा कर
उनका तेज कम कर दिया।
उस समय सूर्य से निकले
हुए तेज -
पुञ्जों को ब्रह्माजी ने
एकत्रित कर भगवान् विष्णु
के ‘सुदर्शन – चक्र ’ के रुप में ,
भगवान् शिव के ‘ त्रिशूल′- रुप
में तथा इन्द्र के ‘वज्र ’ के
रुप में परिणत कर दिया।
‘पद्म -पुराण ’ के अनुसार
भिन्न – भिन्न देवताओं के तेज
से युक्त ‘सुदर्शन – चक्र ’
को भगवान् शिव ने श्रीकृष्ण
को दिया था। ‘ वामन -पुराण ’
के अनुसार भी इस
कथा की पुष्टि होती है।
‘शिव -पुराण ’ के अनुसार
‘खाण्डव -वन ’ को जलाने के
लिए भगवान् शंकर ने
श्रीकृष्ण को ‘ सुदर्शन -चक्र ’
प्रदान किया था। इसके
सम्मुख इन्द्र
की शक्ति भी व्यर्थ थी।
‘वामन -पुराण ’ के अनुसार
दामासुर नामक भयंकर असुर
को मारने के लिए भगवान्
शंकर ने विष्णु को ‘ सुदर्शन-
चक्र ’ प्रदान किया था।
बताया है कि एक बार
भगवान् विष्णु ने देवताओं से
कहा था कि ‘आप लोगों के
पास जो अस्त्र हैं , उनसे
असुरों का वध
नहीं किया जा सकता। आप
सब अपना – अपना तेज दें। ’
इस पर सभी देवताओं ने
अपना – अपना तेज दिया। सब
तेज एकत्र होने पर भगवान्
विष्णु ने भी अपना तेज
दिया। फिर महादेव शंकर ने
इस एकत्रित तेज के
द्वारा अत्युत्तम शस्त्र
बनाया और उसका नाम
‘सुदर्शन – चक्र ’ रखा।
भगवान् शिव ने ‘सुदर्शन-
चक्र ’ को दुष्टों का संहार
करने तथा साधुओं
की रक्षा करने के लिए
विष्णु को प्रदान किया।
‘हरि – भक्ति- विलास ’ में
लिखा है कि ‘सुदर्शन-चक्र ’
बहुत पुज्य है। वैष्णव लोग
इसे चिह्न के रुप में धारण
करें। ‘गरुड़ -पुराण ’ में
‘सुदर्शन – चक्र ’ का महत्त्व
बताया गया है और
इसकी पूजा – विधि दी गई है।
‘श्रीमद् – भागवत ’ में
‘सुदर्शन – चक्र ’
की स्तुति इस प्रकार की गई
है -‘ हे सुदर्शन!
आपका आकार चक्र की तरह
है। आपक े किनारे का भाग
प्रलय – कालीन अग्नि के
समान अत्यन्त तीव्र है।
आप भगवान् विष्णु
की प्रेरणा से सभी ओर
घूमते हैं। जिस प्रकार
अग्नि वायु की सहायता से
शुष्क तृण
को जला डालती है ,
उसी प्रकार आप
हमारी शत्रु – सेना को तत्काल
जला दीजिए। ’
‘विष्णु – धर्मोत्तर -पुराण ’ में
‘सुदर्शन – चक्र ’ का वर्णन
एक पुरुष के रुप में हुआ है।
इसकी दो आँखें तथा बड़ा -
सा पेट है। चक्र का यह रुप
अनेक अलंकारों से सुसज्जित
तथा चामर से युक्त है।
वल्लभाचार्य कृत
‘सुदर्शन -कवच ’—–
वैष्णवानां हि रक्षार्थं ,
श्रीवल्लभः – निरुपितः।
सुदर्शन महामन्त्रो,
वैष्णवानां हितावहः।।
मन्त्रा मध्ये निरुप्यन्ते ,
चक्राकारं च लिख्यते।
उत्तरा – गर्भ- रक्षां च ,
परीक्षित – हिते- रतः।।
ब्रह्मास्त्र – वारणं चैव ,
भक्तानां भय – भञ्जनः। वधं
च सुष्ट -दैत्यानां , खण्डं-
खण्डं च कारयेत्।।
वैष्णवानां हितार्थाय , चक्रं
धारयते हरिः। पीताम्बरो पर-
ब्रह्म, वन – माली गदाधरः।।
कोटि – कन्दर्प-लावण्यो ,
गोपिका -प्राण – वल्लभः। श्री -
वल्लभः कृपानाथो ,
गिरिधरः शत्रुमर्दनः।।
दावाग्नि -दर्प – हर्ता च ,
गोपीनां भय – नाशनः।
गोपालो गोप -कन्याभिः ,
समावृत्तोऽधि – तिष्ठते।।
वज्र – मण्डल- प्रकाशी च ,
कालिन्दी -विरहानलः।
स्वरुपानन्द-दानार् थं,
तापनोत्तर -भावनः।।
निकुञ्ज -विहार-भावाग्ने ,
देहि मे निज दर्शनम्। गो -
गोपिका -श्रुताकीर्णो , वेणु -
वादन -तत्परः।।
काम – रुपी कला -वांश्च ,
कामिन्यां कामदो विभुः।
मन्मथो मथुरा – नाथो ,
माधवो मकर -ध्वजः।।
श्रीधरः श्रीकरश्चैव , श्री-
निवासः सतां गतिः।
मुक्तिदो भुक्तिदोविष्णुः ,
भू – धरो भुत -भावनः।।
सर्व -दुःख – हरो वीरो , दुष्ट -
दानव-नाशकः।
श्रीनृसिंहो महाविष्णुः, श्री-
निवासः सतां गतिः।।
चिदानन्द – मयो नित्यः ,
पूर्ण – ब्रह्म सनातनः। कोटि -
भानु- प्रकाशी च , कोटि – लीला -
प्रकाशवान्।।
भक्त – प्रियः पद्म – नेत्रो ,
भक्तानां वाञ्छित -प्रदः।
हृदि कृष्णो मुखे कृष्णो ,
नेत्रे कृष्णश्च कर्णयोः।।
भक्ति – प्रियश्च श्रीकृष्णः ,
सर्वं कृष्ण – मयं जगत्। कालं
मृत्युं यमं दूतं, भूतं प्रेतं च
प्रपूयते।।
“ॐ नमो भगवते महा-
प्रतापाय महा – विभूति- पतये ,
वज्र – देह वज्र – काम वज्र -
तुण्ड वज्र – नख वज्र -मुख
वज्र – बाहु वज्र – नेत्र वज्र -
दन्त वज्र – कर-कमठ
भूमात्म-कराय , श्रीमकर-
पिंगलाक्ष उग्र -प्रलय
कालाग्नि- रौद्र- वीर-
भद्रावतार पूर्ण -ब्रह्म
परमात्मने , ऋषि -मुनि -
वन्द्य- शिवास्त्र-
ब्रह्मास्त्र- वैष्णवास्त्र-
नारायणास्त्र- काल- शक्ति-
दण्ड-कालपाश -अघोरास्त्र-
निवारणाय , पाशुपातास्त्र-
मृडास्त्र -सर्वशक्ति-
परास्त -कराय , पर – विद्या-
निवारण अग्नि -दीप्ताय ,
अथर्व -वेद- ऋग्वेद- साम -
वेद -यजुर्वेद- सिद्धि-कराय ,
निराहाराय , वायु – वेग मनोवेग
श्रीबाल-
कृष्णः प्रतिषठानन्द -
करः स्थल -जलाग्नि -गमे
मतोद् -भेदि , सर्व – शत्रु छेदि -
छेदि, मम बैरीन्
खादयोत्खादय , सञ्जीवन -
पर्वतोच्चाटय, डाकिनी – शाक
िनी – विध्वंस – कराय महा -
प्रतापाय निज – लीला-
प्रदर्शकाय निष्कलंकृत -
नन्द-कुमार – बटुक- ब्रह्मचारी
-निकुञ्जस्थ-भक्त – स्नेह-
कराय दुष्ट – जन-स्तम्भनाय
सर्व-पाप – ग्रह- कुमार्ग-
ग्रहान् छेदय छेदय, भिन्दि-
भिन्दि, खादय, कण्टकान्
ताडय ताडय मारय मारय,
शोषय शोषय, ज्वालय-
ज्वालय, संहारय – संहारय ,
(देवदत्तं ( नाशय नाशय ,
अति – शोषय शोषय , मम
सर्वत्र रक्ष रक्ष, महा -
पुरुषाय सर्व – दुःख-
विनाशनाय ग्रह- मण्डल- भूत-
मण्डल- प्रेत- मण्डल- पिशाच-
मण्डल उच्चाटन उच्चाटनाय
अन्तर-भवादिक – ज्वर-
माहेश्वर – ज्वर- वैष्णव-
ज्वर-ब्रह्म – ज्वर-विषम -
ज्वर -शीत – ज्वर- वात- ज्वर-
कफ- ज्वर-एकाहिक -द्वाहिक-
त्र्याहिक- चातुर्थिक- अर्द्ध-
मासिक मासिक षाण्मासिक
सम्वत्सरादि- कर भ्रमि -
भ्रमि, छेदय छेदय,
भिन्दि भिन्दि, महाबल-
पराक्रमाय महा -विपत्ति-
निवारणाय भक्र -जन- कल्पना
- कल्प- द्रुमाय- दुष्ट- जन-
मनोरथ-स्तम्भनाय
क्लीं कृष्णाय गोव िन्दाय
गोपी -जन – वल्लभाय नमः।।
पिशाचान् राक्षसान् चैव, हृदि
- रोगांश्च दारुणान् भूचरान्
खेचरान् सर्वे ,
डाकिनी शाकिनी तथा।।
नाटकं चेटकं चैव, छल -छिद्रं
न दृश्यते। अकाले मरणं
तस्य, शोक – दोषो न
लभ्यते।।
सर्व -विघ्न- क्षयं यान्ति ,
रक्ष मे गोपिका – प्रियः। भयं
दावाग्नि- च ौराणां, विग्रहे
राज – संकटे।।
।।फल -श्रुति।।
व्याल -व्याघ्र -महाशत्रु- वैरि
- बन्धो न लभ्यते। आधि -
व्याधि-हरश्चैव , ग्रह -पीडा -
विनाशने।।
संग्राम -जयदस्तस्माद् ,
ध्याये देवं सुदर्शनम्।
सप्तादश इमे श्लोका ,
यन्त्र – मध्ये च लिख्यते।।
वैष्णवानां इदं यन्त्रं,
अन्येभ्श्च न दीयते। वंश -
वृद्धिर्भवेत् तस्य, श्रोता च
फलमाप्नुयात्।।
सुदर्शन -महा -मन्त्रो , लभते
जय – मंगलम्।।
सर्व – दुःख- हरश्चेदं , अंग-
शूल-अक्ष -शूल- उदर- शूल-
गुद -शूल -कुक्षि- शूल- जानु-
शूल-जंघ -शूल -हस्त -शूल -
पाद-शूल – वायु-शूल – स्तन-
शूल- सर्व- शूलान् निर्मूलय ,
दानव – दैत्य- कामिनि वेताल -
ब्रह म्- राक्षस -कालाहल-
अनन्त – वासुकी- तक्षक-
कर्कोट – तक्षक- कालीय-
स्थल -रोग -जल- रोग- नाग-
पाश- काल- पाश- विषं निर्विषं
कृष्ण! त्वामहं शरणागतः।
वैष्णवार्थं कृतं यत्र
श्रीवल्लभ- निरुपितम्।। ॐ
इसका नित्य प्रातः और
रात्री में सोते समय पांच -
पांच बार पाठ करने मात्र से
ही समस्त शत्रुओं का नाश
होता है और शत्रु
अपनी शत्रुता छोड़ कर
मित्रता का व्यवहार करने
लगते है.
शुभमस्तु!!!!

 

 

 

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|| नारायणास्त्रम् ||

।। नारायणास्त्रम् ।।
हरिः ॐ नमो भगवते श्रीनारायणाय
नमो नारायणाय विश्वमूर्तये
नमः श्री पुरुषोत्तमाय पुष्पदृष्टिं प्रत्यक्षं
वा परोक्षं अजीर्णं पञ्चविषूचिकां हन हन ऐकाहिकं
द्वयाहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं ज्वरं नाशय नाशय
चतुरशितिवातानष्टादशकुष्ठान् अष्टादशक्षय
रोगान् हन हन सर्वदोषान् भंजय भंजय तत्सर्वं
नाशय नाशय आकर्षय आकर्षय शत्रून् शत्रून्
मारय मारय उच्चाटयोच्चाटय विद्वेषय विद्वेषय
स्तंभय स्तंभय निवारय निवारय विघ्नैर्हन
विघ्नैर्हन दह दह मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय
चक्रं गृहीत्वा शीघ्रमागच्छागच्छ चक्रेण
हत्वा परविद्यां छेदय छेदय भेदय भेदय
चतुःशीतानि विस्फोटय विस्फोटय
अर्शवातशूलदृष्टि सर्पसिंहव्याघ्र द्विपदचतुष्पद
पद बाह्यान्दिवि भुव्यन्तरिक्षे अन्येऽपि केचित्
तान्द्वेषकान्सर्वान् हन हन
विद्युन्मेघनदी पर्वताटवीसर्वस्थान
रात्रिदिनपथचौरान् वशं कुरु कुरु हरिः ॐ
नमो भगवते ह्रीं हुं फट् स्वाहा ठः ठं ठं
ठः नमः ।।
।। विधानम् ।।
एषा विद्या महानाम्नी पुरा दत्ता मरुत्वते ।
असुराञ्जितवान्सर्वाञ्च्छ क्रस्तु बलदानवान् ।।
१।।
यः पुमान्पठते भक्त्या वैष्णवो नियतात्मना ।
तस्य सर्वाणि सिद्धयन्ति यच्च दृष्टिगतं विषम्
।। २।।
अन्यदेहविषं चैव न देहे संक्रमेद्ध्रुवम् ।
संग्रामे धारयत्यङ्गे शत्रून्वै जयते क्षणात् ।।
३।।
अतः सद्यो जयस्तस्य विघ्नस्तस्य न जायते ।
किमत्र बहुनोक्तेन सर्वसौभाग्यसंपदः ।। ४।।
लभते नात्र संदेहो नान्यथा तु भवेदिति ।
गृहीतो यदि वा येन बलिना विविधैरपि ।। ५।।
शतिं समुष्णतां याति चोष्णं शीतलतां व्रजेत् ।
अन्यथां न भवेद्विद्यां यः पठेत्कथितां मया ।।
६।।
भूर्जपत्रे लिखेन्मंत्रं गोरोचनजलेन च ।
इमां विद्यां स्वके बद्धा सर्वरक्षां करोतु मे ।।
७।।
पुरुषस्याथवा स्त्रीणां हस्ते बद्धा विचेक्षणः ।
विद्रवंति हि विघ्नाश्च न भवंति कदाचनः ।। ८।।
न भयं तस्य कुर्वंति गगने भास्करादयः ।
भूतप्रेतपिशाचाश्च ग्रामग्राही तु डाकिनी ।। ९।।
शाकिनीषु महाघोरा वेतालाश्च महाबलाः ।
राक्षसाश्च महारौद्रा दानवा बलिनो हि ये ।।
१०।।
असुराश्च सुराश्चैव अष्टयोनिश्च देवता ।
सर्वत्र
स्तम्भिता तिष्ठेन्मन्त्रोच्चारणमात्रतः ।। ११।।
सर्वहत्याः प्रणश्यंति सर्व फलानि नित्यशः ।
सर्वे रोगा विनश्यंति विघ्नस्तस्य न बाधते ।।
१२।।
उच्चाटनेऽपराह्णे तु संध्यायां मारणे तथा ।
शान्तिके चार्धरात्रे तु ततोऽर्थः सर्वकामिकः ।।
१३।।
इदं मन्त्ररहस्यं च नारायणास्त्रमेव च ।
त्रिकालं जपते नित्यं जयं प्राप्नोति मानवः ।।
१४।।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं ज्ञानं विद्यां पराक्रमः ।
चिंतितार्थ सुखप्राप्तिं लभते नात्र संशयः ।।
१५।।
।। इति नारायणास्त्रम् ।।

 

 

 

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|| श्री गणेश अथर्वशीर्ष ||

मंगलकारी है श्री गणपति अथर्वशीर्ष
गणेशोत्सव के 10 दिनों में गणेशजी की आराधना बहुत
मंगलकारी मानी जाती है। उनके ‍भक्त विभिन्न प्रकार
से उनकी आराधना करते हैं। अनेक श्लोक, स्तोत्र,
जाप द्वारा गणेशजी को मनाया जाता है। इनमें से
गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ भी बहुत मंगलकारी है।
प्रतिदिन प्रात: शुद्ध होकर इस पाठ करने से
गणेशजी की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। पेश है
गणपति अथर्वशीर्ष का हिन्दी अनुवाद सहित पाठ-
गणपति अथर्वशीर्ष
ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽ सि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।
अर्थ- ॐकारापति भगवान गणपति को नमस्कार है। हे
गणेश! तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्व हो। तुम्हीं केवल
कर्ता हो। तुम्हीं केवल धर्ता हो। तुम्हीं केवल
हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपों में
विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात नित्य
आत्मस्वरूप हो।
ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।
मैं ऋत न्याययुक्त बात कहता हूँ। सत्य कहता हूँ।
अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो माँ पाहि-पाहि समंतात्।।3।।
हे पार्वतीनंदन! तुम मेरी (मुझ शिष्य की) रक्षा करो।
वक्ता (आचार्य) की रक्षा करो।
श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो।
धाता की रक्षा करो। व्याख्या करने वाले आचार्य
की रक्षा करो। शिष्य की रक्षा करो। पश्चिम से
रक्षा। पूर्व से रक्षा करो। उत्तर से रक्षा करो।
दक्षिण से रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे से
रक्षा करो। सब ओर से मेरी रक्षा करो। चारों ओर से
मेरी रक्षा करो।
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि।।4।।
तुम वाङ्मय हो, चिन्मय हो। तुम आनंदमय हो। तुम
ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो। तुम
प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम दानमय विज्ञानमय हो।
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिकाकूपदानि।।5।।
यह जगत तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत
तुममें लय को प्राप्त होगा। इस सारे जगत की तुममें
प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और
आकाश हो। परा, पश्चंती, बैखरी और
मध्यमा वाणी के ये विभाग तुम्हीं हो।
त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।
तुम सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हो। तुम
जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से
परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म औ वर्तमान तीनों देहों से
परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से
परे हो। तुम मूलाधार चक्र में नित्य स्थित रहते हो।
इच्छा, क्रिया और ज्ञान तीन प्रकार
की शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा योगीजन नित्य ध्यान
करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो,
तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य
हो, तुम चंद्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू:, र्भूव:, स्व:
ये तीनों लोक तथा ॐकार वाच्य पर ब्रह्म भी तुम
हो।
गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सँ हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।
गण के आदि अर्थात ‘ग्’ कर पहले उच्चारण करें।
उसके बाद वर्णों के आदि अर्थात ‘अ’ उच्चारण करें।
उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है। इस प्रकार
अर्धचंद्र से सुशोभित ‘गं’ ॐकार से अवरुद्ध होने पर
तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरूप (ॐ गं) है। गकार
इसका पूर्वरूप है।बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संधान है।
संहिता संविध है। ऐसी यह गणेश विद्या है। इस
महामंत्र के गणक ऋषि हैं। निचृंग्दाय छंद है
श्री मद्महागणपति देवता हैं। वह महामंत्र है- ॐ गं
गणपतये नम:।
एकदंताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।
एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान
करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें।
यह गणेश गायत्री है।
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।
एकदंत चतुर्भज चारों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय
और वरदान की मुद्रा धारण किए तथा मूषक चिह्न
की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लंबोदर वाले सूप जैसे
बड़े-बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर प रक्त
चंदन का लेप किए हुए रक्तपुष्पों से भलिभाँति पूजित।
भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता, जगत के कारण
अच्युत, सृष्टि के आदि में आविर्भूत प्रकृति और
पुरुष से परे श्रीगणेशजी का जो नित्य ध्यान करता है,
वह योगी सब योगियों में श्रेष्ठ है।
नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।
व्रात (देव समूह) के नायक को नमस्कार।
गणपति को नमस्कार। प्रथमपति (शिवजी के गणों के
अधिनायक) के लिए नमस्कार। लंबोदर को, एकदंत को,
शिवजी के पुत्र को तथा श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार-
नमस्कार ।।10।।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।।
यह अथर्वशीर्ष (अथर्ववेद का उपनिषद) है।
इसका पाठ जो करता है, ब्रह्म को प्राप्त करने
का अधिकारी हो जाता है। सब प्रकार के विघ्न उसके
लिए बाधक नहीं होते। वह सब जगह सुख पाता है।
वह पाँचों प्रकार के महान पातकों तथा उपपातकों से
मुक्त हो जाता है।
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।।
सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश
करता है। प्रात:काल पाठ करने वाला रात्रि के
पापों का नाश करता है। जो प्रात:- सायं दोनों समय
इस पाठ का प्रयोग करता है वह निष्पाप हो जाता है।
वह सर्वत्र विघ्नों का नाश करता है। धर्म, अर्थ,
काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।
13।।
इस अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे
नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण देता है वह
पातकी हो जाता है। सहस्र (हजार) बार पाठ करने से
जिन-जिन कामों-कामनाओं का उच्चारण करता है,
उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है।
अनेन गणपतिमभिषिंचति
स वाग्मी भवति
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति
स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति।।14।।
इसके द्वारा जो गणपति को स्नान कराता है, वह
वक्ता बन जाता है। जो चतुर्थी तिथि को उपवास
करके जपता है वह विद्यावान हो जाता है, यह अथर्व
वाक्य है जो इस मंत्र के द्वारा तपश्चरण
करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता।
यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति
स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।
जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का यजन
करता है वह कुबेर के समान हो जाता है।
जो लाजो (धानी-लाई) के द्वारा यजन करता है वह
यशस्वी होता है, मेधावी होता है। जो सहस्र (हजार)
लड्डुओं (मोदकों) द्वारा यजन करता है, वह वांछित
फल को प्राप्त करता है। जो घृत के सहित समिधा से
यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्।।16।।
आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर
सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्य ग्रहण में
महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र
सिद्धि होती है। वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है।
जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है
वह सर्वज्ञ हो जाता ह

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